Chapter 13 Shloka 28

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।।

That Yogi

Because he perceives

the Supreme Purusha equally in all,

he does not destroy his own Self

and attains the Supreme Goal.

Chapter 13 Shloka 28

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।।

Perceiving that Supreme Atma equally in all, that Yogi does not destroy himself.

Because he perceives the Supreme Purusha equally in all, he does not destroy his own Self and attains the Supreme Goal.

Bhagwan says, that he who knows the Atma in essence:

a) renounces his individualistic entity and establishes the Atma essence;

b) becomes an Atmavaan;

c) does not destroy his essential being because he, so to say, returns the kingdom of the Atmaback to the Atma;

d) returns to the Atma what belongs to It;

e) becomes established in the Atma;

f) knows that man’s annihilation of his own essence amounts to inflicting injury upon himself;

g) knows that:

­­–  the true master of this body is not the ‘I’ but Brahm;

­­–  the true creator of this body is not ‘I’ but Brahm;

­­–  the body form truly belongs to the Lord – it is not mine;

­­–  the true purpose of this body is the Lord’s – not mine;

­­–  life’s true pilgrimage undertaken by this body is not mine but the Lord’s.

If this body is not mine and belongs to the Lord, then:

a) every limb becomes His;

b) these eyes become His;

c) these hands are His;

d) these feet are His;

e) my name is His name;

f) my form is His form.

Once having known that Whole Atma Self, one’s very being becomes His. Such a Yogi perceives the world through the eyes of His Lord. He perceives all as his very own. For him the body is a manifestation of the Atma. For him the body becomes someone else’s property.

Why speak of the Goal Supreme,
The Master Himself stands before him!
When that knower of the Supreme manifests himself,
The foolish mind cannot comprehend him!

Little one,

1. To lose sight of your true essence constitutes violence upon the Self.

2. To identify yourself with your body constitutes violence to your Self.

3. To identify yourself with the qualities that inhere within you constitutes violence to your Self.

4. To regard yourself as merely a physical being, constitutes violence to your Self.

When the individual identifies himself with the creation of Prakriti – this body, he then identifies himself also with the inert attributes of that body. He begins to believe that the body is his and the attributes of the body are dependent on him. However, this is not the factual truth. The fact is that the moment one considers one’s true identity to be akin to the transient and ever changing attributes of the body self, it constitutes violence towards the eternal, indestructible Self which we are. This body and its attributes are inert and they do everything in accordance with the innate nature by which they are bound. The Atma is a pure witness and ever a non-doer. Knowing this, if we do not accept it, we are perpetrating violence upon our own Atma Self. Those who accept this truth, know that everyone is a non-doer; they perceive only the Atma Self.

Little one, only such a one truly sees who sees thus. Those who do not perceive these truths, see wrongly.

अध्याय १३

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।।

आत्मा को सर्वत्र सम देखते हुए वह योगी अपने आपको नष्ट नहीं करता। क्योंकि :

शब्दार्थ :

१. वह पुरुष परमात्मा को सम भाव से स्थित देखता है,

२. इसलिये वह आप ही अपनी आत्मा का हनन नहीं करता,

३. वह परम गति को पाता है।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहने लगे कि आत्म तत्त्व जो जान लेता है,

1. जीवत्व भाव त्याग कर वह आत्मा को स्थापित करता है।

2. आत्मवान् वह हो जाता है।

3. वह अपने स्वरूप का हनन नहीं करता क्योंकि वह आत्मा को मानो पुन: उसका राज्य दे देता है।

4. वह मानो आत्मा की वस्तु आत्मा को लौटा देता है।

5. वह मानो आत्मा में स्थित हो जाता है।

6. वह जानता है कि अपने स्वरूप का हनन करना ही हिंसा है।

7. वह जानता है कि :

क) इस तन का वास्तविक मालिक ‘मैं’ नहीं, ब्रह्म है।

ख) इस तन का वास्तविक रचयिता ‘मैं’ नहीं, ब्रह्म है।

ग) इस तन का वास्तविक रूप मेरा नहीं, भगवान का है।

घ) इस तन से वास्तविक प्रयोजन मेरा नहीं, भगवान का है।

ङ) इस तन की वास्तविक जीवन यात्रा मेरी नहीं, भगवान की है।

जब यह तन ही मेरा नहीं, यह उस परम का हो गया तो,

क) हर अंग उसी का हो गया।

ख) नयन उसी के हो गये।

ग) कर उसी के हो गये।

घ) पाद उसी के हो गये।

ङ) मेरा नाम उसी का हो गया।

च) मेरा रूप उसी का हो गया।

छ) पूर्ण आत्म क्या जान लिया, स्वरूप उसी का हो गया। ऐसा योगी राम नयन से जब जग को देखता है, तब उसे सब अपना आप ही दर्शाता है। तब तन केवल आत्म रूप रह जाता है।

ज) तब तन दूजे का रह जाता है।

परम गति की क्या कहें, परम पति हैं सम्मुख खड़े।

जब ब्रह्म वित् रूप धरे, मूर्ख मन उसे न समझ सके।।

नन्हूं!

1. अपने स्वरूप को भुला देना स्वरूप का हनन है

2. अपने आपको तन के तद्‍रूप कर देना स्वरूप का हनन है।

3. अपने आप को गुणों के तद्‍रूप कर देना स्वरूप का हनन है।

4. अपने आप को जड़ मान लेना स्वरूप का हनन है।

जब जीव, प्रकृति की रचना इस तन के तद्‍रूप हो जाता है, तब वह जड़ तन के और जड़ गुणों के भी तद्‍रूप हो जाता है। वह यह मानने लगता है, कि तन उसका है और तन के गुण भी उसके आश्रित हैं, किन्तु इसमें वास्तविकता नहीं है। वास्तव में, नित्य अव्यय अक्षर स्वरूप होते हुए अपने आप को क्षर, परिवर्तनशील तथा गुण पुंज मान लेना ही स्वरूप का हनन है। तन तथा गुण जड़ हैं और वे सब कुछ स्वत: गुणों से बंधे हुए और प्रभावित हुए हुए करते हैं। आत्मा तो केवल उपदृष्टा और नित्य अकर्ता है। यदि इसे जान कर इसे न मानें तो आप अपने ही आत्मा का हनन करने वाले बन जाते हैं। जो यह मान लेते हैं, वे सबको नित्य अकर्ता ही देखते हैं, आत्म स्वरूप ही देखते हैं।

नन्हूं! वास्तव में वही देखते हैं, जो ऐसा देखते हैं। जो ऐसा नहीं देखते, वे ग़लत ही देखते हैं।

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