Chapter 13 Shloka 27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।।२७।।

He who witnesses

the Eternal Supreme Lord as

abiding equally in all perishable beings,

that one truly sees.

Chapter 13 Shloka 27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।।२७।।

He who witnesses the Eternal Supreme Lord as abiding equally in all perishable beings, that one truly sees.

Little one,

a) He who perceives That Supreme One as pervading all beings;

b) He who perceives That Indestructible Essence as abiding equally in creation, sustenance and destruction;

– only that one sees.

1. That blemishless One abides in this totality.

2. That formless One is all forms.

3. That One pervades all spheres.

4. He who knows Him knows His essence:

­­–  that He permeates every form;

­­–  that naught exists but That Atma;

­­–  that naught exists but That Supreme Atma.

­­–  Just as in the simile of the dream naught exists but the dreamer, so also only the Supreme exists in this entire Creation.

This is the factual truth.

a) Nothing exists apart from the Atma.

b) If you identify yourself with the Atma, you will know that the Supreme Lord truly abides in all.

c) If you can transcend the body, you will know that the Atma pervades all equally.

d) When your attachment with the gross dwindles, then you will be able to perceive that the Atma abides in all.

e) When attachment with the gross is erased, you will know that the Atma abides equally in all.

f) When one’s attachment with one’s individuality ceases, one will awaken to the realisation of the Atma’s omnipresent existence.

Look Kamla! When the body, mind and intellect are no longer yours and belong wholly to the Supreme, then you will be able to understand the state of samadhi or absorption in the Self. When this body is no longer yours, then perhaps you will be able to perceive all this more clearly. Such an Atmavaan then realises that all are equal in the Atma. He knows then that differences in nature and attributes exist everywhere and in everything – but theAtma is One. He realises that the original fount of all is the Atma, the Truth – whether others perceive it as such or not. Differentiation of attributes lies only on the surface and are not in anybody’s control. All the qualitative differences lie within the sphere of Prakriti. From this point of view, all individuals are essentially blameless. The Atmavaan knows that the veil of attributes and the veil of ignorance have cloaked that eternal Embodiment of Bliss Itself; thus he bears only compassion towards all such ignorant souls. The behaviour and interaction of such a one with different people is very disparate due to the differences of attributes and nature of each one. However, even though his interaction may present differences, he looks upon all equally and impartially.

His interaction is in identification with the person in front of him. With the proud, he is pride itself and with the humble, he is humility itself. He often identifies with the wicked and, performing actions like them, endeavours to lift them from their nefarious ways; i.e. He dons a form similar to the one in front of him. Maybe this is the reason why he often has to face so much censure and criticism. Therefore the Lord says,

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

“Those foolish souls who are ignorant of My Supreme Existence as the Peerless Lord of all beings, don human bodies and know Me not.”

(Chp.9, shloka 11)

अध्याय १३

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।।२७।।

अब भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :   

१. जो सब भूतों में सम भाव से स्थित

२. और नाशवानों में अविनाशी परमेश्वर को देखता है,

३. वही यथार्थ देखता है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं!

क) पूर्ण भूतों में परिपूर्ण जो उस परम को देखता है,

ख) उत्पत्ति, स्थिति, लय, सबमें सम अक्षर तत्त्व को देखता है,

केवल वही देखता है।

1. निर्विकार वह अखिल में है।

2. निराकार वह अखिल रूप भी है।

3. हर जा व्यापक वह ही है।

4. जो जाने वह जाने स्वरूप, हर रूप में वह ही है।

– आत्म बिना और कुछ नहीं है।

– परमात्म बिना और कुछ भी नहीं है।

– ज्यों स्वप्न की रचना में सब दृष्टा में ही हो रहा होता है, स्वप्न दृष्टा बिन वहाँ कुछ भी नहीं होता, त्यों पूर्ण सृष्टि में परम बिना कुछ नहीं है।

वास्तविक सत् भी यह ही है।

क) आत्म बिन कुछ भी नहीं है।

ख) आत्म तद्‍रूप गर हो जाओ तो जानो कि सच ही परमेश्वर सब में स्थित है।

ग) तन से गर उठ सको तो जान सकोगे कि आत्म सबमें सम रूप में स्थित है।

घ) जब स्थूल से संग मिटे तो जान सकोगे कि सबमें आत्म स्थित है।

ङ) जब देहात्म बुद्धि से संग मिट जायेगा तो जान सकोगे कि सबमें आत्म सम रूप में स्थित है।

च) जब जीवत्व भाव से संग मिट जायेगा तो जान सकोगे कि सबमें आत्म स्थित है।

पर देख कमला! जब तन, मन, बुद्धि, तुम्हारे नहीं रहे, वे पूर्ण रूप से परम के हो गये, तब यह आत्मा की समाधि अथवा स्थिति समझ आ सकती है। जब यह तन तेरा नहीं रहेगा तो शायद कुछ समझ आ ही जायेगा। तब जीव, या कहें वह आत्मवान् यह जान लेता है कि आत्म रूप में सब समान हैं। तब वह आत्मवान् यह जान लेता है कि प्राकृतिक गुण भेद सबमें हैं किन्तु आत्मा एक ही है। चाहे कोई जाने या न जाने, सत्यता यही है कि सबका मूल आत्म ही है। गुण भेद केवल दर्शन मात्र ही है और किसी के बस में नहीं है। गुण भेद जिसके जैसे भी हैं, वह भी प्रकृति ने ही रचे हैं। इस नाते हर जीव वास्तव में निर्दोष ही है। फिर, आत्मवान् यह जानते हैं कि गुण आवरण या अज्ञान आवरण ही उस नित्य आनन्द स्वरूप को आवृत किये बैठा है, इस कारण वह सबके प्रति करुणा की दृष्टि रखते हैं; किन्तु गुण भेद होने के कारण उनका वतर्न विभिन्न लोगों से विभिन्न प्रकार का होता है। उन्हें ‘समदर्शी’ कहते हैं, ‘समवर्ती’ नहीं कहते।

वर्तन तो सम्मुख आये जीव के गुणों के अनुकूल होगा। वर्तन में, गुमानियों के साथ वे महा गुमानी और झुके हुओं के पास महा झुके हुए होते हैं। बुरों के साथ, उनके जैसे कर्म करते हुए वे उन्हें बुराई से उठा लेते हैं। यानि, जैसा सामने आये, वैसा रूप धर लेते हैं। तभी तो वे बदनाम भी होते हैं।

तभी तो भगवान ने कहा :

‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।’ (9/11)

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