Chapter 13 Shloka 20

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२०।।

Prakriti is the cause of both Kaarya

(the five principle elements)

and Karan (the faculties);

Purusha is the cause of

experiencing joy and sorrow.

Chapter 13 Shloka 20

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२०।।

The Lord says:

Prakriti is the cause of both Kaarya (the five principle elements) and Karan (the faculties); Purusha is the cause of experiencing joy and sorrow.

Kaarya (कार्य)

1. The five principle elements – ether, wind, fire, water and earth.

2. The objects of the organs of perception – sound, touch, form, taste and smell.

Karan (करण)

a) Intellect, ego, mind (along with the mind-stuff), i.e. the inner being.

b) The faculties of hearing, touch, vision, taste and breathing.

c) Hands, speech, feet, the organs of excretion and digestion.

All the above are constituents of Prakriti; in fact it could be said that they are Prakriti. They emerge from Prakriti and are re-absorbed by Prakriti.

Purusha (पुरुष)

Here the connotation of the word ‘Purusha’ is:

1. The authoritative entity of the Atma.

2. The conscious Atma.

3. The uninfluenceable Atma.

4. The detached Atma.

And yet it is stated here that the Purusha as the individual entity is the cause of the experience of joy and sorrow. Understand this fact now.

Atma + Prakriti

Little one, Prakriti gains its vitality from the Atma. It is Atma which lends vigour to the threefold energy of Prakriti. The intellect too, gains its consciousness from the Atma. The intellect then becomes the cause of ego, the ego causes the mind, the mind becomes the instrument of the sense faculties and the sense faculties become the instrument of the sense objects.

Prakriti, being inert, has the capacity to partake of objects but not the ability to experience them. Qualities are inert; they have the potential to partake of sense objects but they cannot enjoy these. The Purusha on the other hand does not have the capacity to partake of material objects; yet, conjoined with Prakriti, the ability to experience those objects of sense is created, along with which comes the consciousness of being the enjoyer.

Prakriti and Purusha are both without origin or cause; when there is attachment between the two, joy and sorrow emanate. The idea of enjoyership is born as a result of attachment.

Little one, the creation of the entire universe is automatic and spontaneous.

1. It is wrought by the three qualities.

2. It is sustained by those three qualities.

3. It is destroyed by the action of the same three qualities.

4. Prakriti, which is constituted of the three main qualities or gunas, endows man with individual qualities.

Purusha is that conscious energy which:

a) despite being a non-doer, has become the reason for the idea of doership in the individual;

b) has become responsible for both joy and sorrow;

c) fills vitality into all dual forces and tendencies;

d) becomes the cause of moha, attachment and ignorance.

Thus it is the Purusha that separates itself and becomes bound in the mortal soul of an individual.

1. It becomes attached to the qualities.

2. It becomes attached to the body.

3. It becomes chained to the idea of doership.

4. It becomes fettered by the idea of enjoyership.

Little one, the intellect in actual fact is inert and insentient. However, in the presence of the Atma, it:

a) gains consciousness;

b) begins to experience the beauty of the Atma;

c) reflects the Atma.

1. The intellect erroneously begins to believe “I am the divine Atma.”

2. The intellect becomes proud of its ability to discern.

3. The intellect begins to take pride in itself, believing itself to be superior, not knowing that it has gained its authority from another’s power.

It was the nature of the mind to plan, to get attached and to cogitate. If the intellect itself makes the initial mistake and identifies itself with the body, just imagine the confusion of the poor mind! It, too, becomes inextricably attached to sense objects and the body self.

The ‘I’ is born when:

1. The intellect identifies itself with the body.

2. The intellect becomes attached to its own way of thinking.

3. Under the rule of such an intellect the mind becomes obsessed with sense objects.

Thus the intellect that caters to the body becomes the root cause of erroneous rumination and of all aberrations of the mind. The Purusha, which should have remained ever detached and uninfluenceable, becomes individualised and experiences both joy and sorrow.

अध्याय १३

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२०।।

अब भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. कार्य और करण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कहलाती है।

२. सुख दु:ख के भोक्तापन में हेतु पुरुष कहा जाता है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं! प्रथम कार्य को समझ ले।

कार्य :

1. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी यह पंचमहाभूत कार्य हैं।

2. शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध यह इन्द्रिय विषय और कार्य हैं।

करण :

क) बुद्धि, अहंकार और मन (चित्त सहित), यह अन्त:करण;

ख) श्रोत्, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण;

ग) हस्त, वाक, पाद, उपस्त और गुदा; यह करण कहलाते हैं।

यह सब प्रकृति के अंग हैं, यह सब प्रकृति ही है। प्रकृति ही इनका कारण है, प्रकृति से ही यह उत्पन्न होते हैं, प्रकृति में ही यह लय होते हैं।

पुरुष :

पुरुष से यहाँ

1. महा आत्म सत्ता से अभिप्राय है।

2. चेतन आत्मा से अभिप्राय है।

3. नित्य निर्लिप्त आत्म सत्ता से अभिप्राय है।

4. निरासक्त आत्म सत्ता से अभिप्राय है।

फिर भी यहाँ पर कहा है कि जीवात्मा रूपा पुरुष सुख दु:ख के भोक्तापन में हेतु है, अब इसे समझ ले :

आत्मा + प्रकृति

नन्हूं! आत्मा की सत्ता में ही प्रकृति चेतनावान् होती है और प्रकृति की त्रिगुणात्मिका शक्ति शक्तिवान् बनती है। फिर, आत्मा की सत्ता में ही जीव की बुद्धि में चेतना उत्पन्न होती है। तब बुद्धि अहंकार का कारण बनती है, अहंकार मन का कारण बनता है, मन इन्द्रियों का कारण बनता है और फिर इन्द्रियाँ विषयों का कारण बनती हैं।

प्रकृति जड़ है, इसमें भोग करने की शक्ति तो है, किन्तु भोग का अनुभव नहीं है। गुण जड़ हैं, इनमें भोग करने की शक्ति तो है, किन्तु भोग का अनुभव नहीं है। पुरुष नित्य अभोक्ता है, किन्तु प्रकृति से संग हो जाने के कारण उसमें भोक्तापन उत्पन्न होता है, भोक्तापन की प्रतीति होती है।

प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, जब इनका संग होता है तो दु:ख सुख की प्रतीति होती है। भोक्तृत्व भाव का जन्म संग के कारण ही होता है।

नन्हीं! सम्पूर्ण सृष्टि की रचना स्वत: होती है। इसे,

1. त्रैगुण रचते हैं।

2. त्रैगुण स्थापित करते हैं।

3. त्रैगुण ही इसका संहार करते हैं।

4. यह त्रैगुण पूर्ण प्रकृति ही हर जीव में गुण भरती है।

पुरुष ही वह चेतन शक्ति है जो,

क) अकर्ता होते हुए भी जीव में कर्तृत्व भाव का कारण बनी है।

ख) सुख दु:ख का कारण बनी है।

ग) सम्पूर्ण द्वन्द्व पूर्ण वृत्तियों में शक्ति भरती है।

घ) मोह, संग, अज्ञान, उत्पन्न करने का हेतु बनती है।

यह पुरुष ही व्यक्तिगत भाव में आकर जीवात्म भाव में बधित हो जाता है। तब वह :

1. गुणों से संग कर बैठता है।

2. तन से संग कर बैठता है।

3. कर्तृत्व भाव में बधित हो जाता है।

4. भोक्तृत्व भाव में बधित हो जाता है।

नन्हीं! वास्तव में बुद्धि जड़ ही होती है, किन्तु आत्मा की सत्ता में,

– यह चेतन सी हो जाती है।

– इसमें आत्मा का आभास सा होता है।

– इसमें आत्मा का बिम्ब सा पड़ता है।

क) बुद्धि ने नाहक ही यह समझ लिया, कि ‘मैं ही दिव्य आत्मा हूँ।’

ख) बुद्धि को अपनी बोध शक्ति पर गुमान हो गया ।

ग) बुद्धि नाहक अपने आप को श्रेष्ठ मानने लग गई।

घ) बुद्धि यह तो जान न सकी कि वह किसी और से सत्ता पाकर सत्तावान् हुई है; वह अपने पर ही नाज़ करने लग गई।

फिर मन का गुण था, संकल्प करना, संग करना और चिन्तन करना। जब बुद्धि ही भूल कर गई और देह को अपना मान गई तो तुम ही सोचो बेचारा मन क्या करता? वह भी तन तथा विषयों से संग करने लगा।

‘मैं’ का जन्म तब हुआ :

1. जब बुद्धि अपने आपको तन मानने लगी।

2. जब बुद्धि को अपने आप से संग हो गया।

3. जब बुद्धि के राज्य में मन विषय आसक्त हो गया।

यानि देहात्म बुद्धि ही सम्पूर्ण मिथ्यात्व रमण और मन के विकारों का कारण बन गई। पुरुष, जिसे नित्य निरासक्त होना था, वह व्यक्तिगत होकर दु:ख सुख का भोक्ता हो गया।

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