Chapter 13 Shloka 19

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।१९।।

Know that both Prakriti and Purusha

are without origin; know also

that all aberrations and all attributes

originate from Prakriti.

Chapter 13 Shloka 19

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।१९।।

Know that both Prakriti and Purusha are without origin; know also that all aberrations and all attributes originate fromPrakriti.

Prakriti

Little one, now understand that Prakriti, i.e. the five essential elements, the mind, the intellect, ego, the threefold energy which is the cause of all actions, is also called ‘kshetra’.

Purusha

a) Pure consciousness.

b) The individual Atma.

c) The fraction of the Supreme.

d) That constituent of Brahm which can be intuitively experienced.

e) Pure existence.

f) The Atma Itself.

g)The power of the jivatma.

The Lord says, “Both these are without beginning. Also, the aberrations and the modifications that arise in the individual originate from Prakriti.” The Lord says, “Look! Nothing is in the hands of the individual. All qualities that comprise that particular being are a benediction of Prakriti. The Purusha is the Atma and Prakriti is anatma.”

However Kamla, now let me explain this from your point of view. From this statement of the Lord, do not draw the conclusion that you are never at fault since it is Prakriti that creates all. Nor must you feel that you cannot do anything.

Thinking in this manner the individual usually:

1. Renounces the path of shreya or the northward path.

2. Relinquishes his duties.

3. Ceases to glorify the Lord.

4. Stops treading the path of Truth.

However, one whose eyes are open to the Truth, who transcends all qualities and ceases to be influenced by the qualities of others as well as his own, who seeks the refuge of the Lord, how can such a one ever be subdued by his own qualities?

a) On the contrary, he uses all his potential for the welfare of all beings.

b) He will do nothing for the establishment of his own body self.

c) He will do nothing to please his own mind.

His idea of individuality ceases to exist.

A man must consider himself responsible for his own deeds as long as he remains attached to Prakriti and its insentient nature. Once he renounces the body idea and merges into the Atma, he himself will be master of all qualities and will cease to be influenced by any qualities whatsoever.

Little one, understand this once again. The Lord has just said that both Purusha and Prakriti are without beginning. He has not said that they are eternal. The world exists for the individual only as long as modifications persist in his mind due to his attachment with Prakriti. This sphere of the mind is in reality the root of illusion.

The idea of individual entity and Prakriti are without beginning so long as:

1. The triad is not eliminated.

2. The intellect which is subservient to the body persists.

When the individual is successful in transforming knowledge into practice, all aberrations and modifications of the mind cease and the Jivatma merges into his true Self. Then he is absorbed – Indestructible into the Indestructible; then he becomes completely silent towards the world. The body that remains is visible to the world; it has become meaningless for that Atmavaan. He no longer thinks of his body from the point of view of the ‘I’. He is distanced from the appendages of name and form.

It matters not to him:

a) as to who calls him by what name;

b) as to who abuses or defames him;

c) as to who uses his body and for what purpose!

अध्याय १३

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।१९।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को भी तू अनादि समझ

२. और सब विकारों तथा गुणों को, तू प्रकृति से उत्पन्न हुआ जान।

तत्त्व विस्तार :

प्रकृति :

नन्हीं लाडली! अब समझ! परम की प्रकृति, यानि, पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, और त्रिगुणात्मिका शक्ति, जो समस्त क्रियाओं का कारणभूत है; इस को क्षेत्र भी कहा गया है।

पुरुष :

क) शुद्ध चेतनता को कहा है,

ख) जीवात्मा को कहा है,

ग) परम के अंश को कह लो,

घ) ब्रह्म के आभासमात्र अंश को कह लो,

ङ) शुद्ध अस्तित्व को कह लो,

च) आत्म तत्त्व को कह लो,

छ) जीवात्म सत्ता को कह लो।

भगवान कहते हैं, ‘यह दोनों अनादि हैं तथा जीव में जो विकार तथा गुण उत्पन्न हुए हैं, इन्हें तू प्रकृति से उत्पन्न हुए जान।’ वह कहते हैं, देख! जीव के बस में कुछ नहीं। गुण, जो जीव में हैं, वे प्रकृति की देन हैं। पुरुष आत्मा है और प्रकृति अनात्म है।

पर कमला देख! अब तुम्हारे दृष्टिकोण से कहते हैं। इससे यह न समझ लेना कि तुम कुछ कर नहीं सकती, या तुम्हारा कोई कसूर नहीं है किसी बात में, क्योंकि यह सब प्रकृति की रचना है।

ऐसा सोचकर जीव अधिकांश :

1. श्रेय पथ छोड़ देते हैं।

2. कर्तव्य पथ छोड़ देते हैं।

3. भगवान का भजन छोड़ देते हैं।

4. सत् पथ अनुसरण छोड़ देते हैं।

जिसकी आन्तर दृष्टि खुल जाये, जो गुणातीत हो जाये, जो भगवान के शरणापन्न हो जाये, उसके गुण उसे क्या दबायेंगे ?

वह तो,

क) अपने सम्पूर्ण गुण, भूतों के हित के लिए इस्तेमाल करेगा।

ख) अपने तन को स्थापित करने के लिए कुछ भी नहीं करेगा।

ग) अपने मन को रिझाने के लिए कुछ भी नहीं करेगा।

उसका तो जीवत्व भाव ही ख़त्म हो जाता है।

जब तक जीव अनात्म प्रकृति से संग करता है, तब तक वह अपने कर्मों का स्वयं ज़िम्मेवार है, ऐसा उसे मानना चाहिये। जब वह तनत्व भाव छोड़ कर आत्मा में विलीन हो जायेगा, तब वह स्वत: गुणों पर प्रभुत्व पा लेगा और गुणातीत हो जायेगा।

नन्हीं! इसे फिर से समझ। प्रकृति और पुरुष को भगवान ने अनादि कहा है, अक्षर नहीं कहा। संसार तब तक ही कोई अस्तित्व रखता है, जब तक प्रकृति से संग के कारण जीव के मन में विकार उठते रहते हैं। यह मनो लोक ही पूर्ण मिथ्यात्व की जड़ है।

जीवत्व भाव तथा प्रकृति तब तक अनादि हैं,

1. जब तक त्रिपुटी भंजन नहीं हुआ।

2. जब तक देहात्म बुद्धि है।

जब जीव ज्ञान को विज्ञान में परिणित कर देता है तो सम्पूर्ण मनोविकार नष्ट हो जाते हैं और जीवात्मा अपने स्वरूप में लय हो जाता है। तब वह मानो अक्षर में अक्षर हो जाता है और संसार के प्रति नितान्त मौन हो जाता है। तन, जो बाक़ी रह जाता है, वह संसार को ही दिखता है। उस आत्मवान् के लिए वह भी निरर्थक हो जाता है। उसे तो मानो ‘मैं’ के नाते देह अनुसंधान ही नहीं रहता। वह तो नाम तथा रूप की उपाधि से परे हो जाता है।

उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि,

क) कोई उसे किस नाम से बुलाता है।

ख) उसके तन का कोई कैसे अपमान करता है।

ग) उसके तन का कोई कैसे इस्तेमाल करता है।

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