Chapter 13 Shloka 17

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

Now the Lord extols the luminous essence of

the Supreme AtmaIt is the Light of all lights

and transcends the darkness of tamas; It is knowledge

and the object of knowledge and worthy of being known

through knowledge. It abides in the hearts of all.

Chapter 13 Shloka 17

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

Now the Lord extols the luminous essence of the Supreme Atma.

It is the Light of all lights and transcends the darkness of tamas; It is knowledge and the object of knowledge and worthy of being known through knowledge. It abides in the hearts of all.

a) It is the luminosity in all light, It is light itself.

b) It is the light that illuminates Adhyatam.

c) Truth itself becomes illuminated with Its light.

d) Even the untrue comes to light with the help of Its luminescence.

There is no trace of darkness where It abides. It is Light Itself, Adhyatam Itself, Luminescence Itself.

Knowledge is that which has already been described as:

a) the divine nature of the Supreme;

b) egolessness;

c) absence of pride and violence;

d) forgiveness and simplicity;

e) detachment and equanimity;

f) dispassion;

g) devotion replete with unswerving yoga;

h) knowledge of Adhyatam, that is true knowledge;

i)  that which invokes supreme joy and bliss in one’s life.

Little one, when this knowledge illuminates your life, then you will begin to understand, to some degree, That One who is worthy of being known. That One can be understood by knowledge – but what is knowledge, understand this once again. Theoretical knowledge is not being described as knowledge here.

1. The word ‘humility’ is not knowledge – to become humble is the acquisition of true knowledge.

2. The word ‘forgiveness’ is not knowledge – to forgive is true knowledge.

3. The explanation of love does not constitute knowledge – to love is the proof of true knowledge.

4. Discussions on knowledge do not constitute wisdom; knowledge is that which transforms you into the embodiment of wisdom.

5. Adhyatam can only be proved through the example of practice.

Little one, you know only as much as you can give practical shape to in your life. The knowledge that you know merely in theory, know it to be ignorance. That knowledge which does not prevail in practice is devoid of life. You can breathe life into knowledge only by putting your own life breath into it – by offering your live body as its instrument. If knowledge comes alive thus, your life will become established in the Supreme. You will then automatically renounce the anatma, or that which is not the Atma, in your life.

Therefore the Lord says that it is only through the means of knowledge that the Kshetragya can be known. The Lord now says that the Kshetragya abides in the heart.

Heart

1. The heart is considered to be the abode where the Atma and the Supreme Paramatma can be perceived.

2. The heart lies beyond both the mind and the body.

3. The heart is the abode of silence.

4. The individual has to silence both the mind and the intellect in order to reach the heart.

5. The individual has to necessarily purify his mind-stuff in order to reach the heart.

6. The heart does not have the capacity to cogitate.

7. There is no place for the ‘I’ in the heart.

8. The heart does not have the power to find fault.

9. The heart does not have the capacity to criticise or blame another.

10. The heart has no conceit on account of any attributes one may possess.

11. The heart is incapable of pride.

12. It is against the nature of the heart to dwell in revenge or opposition.

13. The heart is incapable of attractions and repulsion – raag and dvesh.

Little one, the heart is the silent abode of the Atma. Therefore the Lord proclaims that the Atma abides in every heart.

Little aspirant of yoga with the Atma!

1. To translate into your life those theoretical definitions of knowledge that you have come to know, is true wisdom.

2. To become an embodiment of those definitions is true wisdom.

3. If your body becomes an image of those qualities, then knowledge will come alive within you – because your body is alive. Otherwise, this knowledge will remain a mere figment of your imagination.

Thus the Lord has first elucidated what is true knowledge. Now He says that the Divine Goal can be known through knowledge. It is impossible to understand That One without the support of knowledge. It is impossible to know That One without becoming an embodiment of Knowledge.

अध्याय १३

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

अब परमात्मा का प्रकाशमय स्वरूप वर्णन करते हैं :

शब्दार्थ :

१. वह पूर्ण ज्योति की भी ज्योति हैं,

२. तम रूप अन्धकार से परे कहे जाते हैं,

३. वह ज्ञान और ज्ञेय हैं और ज्ञान से जानने योग्य हैं

४. और सबके हृदय में स्थित हैं।

तत्त्व विस्तार :

क) हर ज्योति में ज्योति उसकी है, ज्योति स्वरूप वह आप हैं।

ख) अध्यात्म में जो प्रकाश है, वह प्रकाश स्वरूप वह आप हैं।

ग) उससे ज्योति पाकर के सत् दीदायमान होता है।

घ) उससे ज्योति पाकर के असत् भी प्रकाशित होता है।

अन्धकार का वहाँ पे नाम नहीं है। वह जो भी है प्रकाश ही है, अध्यात्म ही है, ज्योति ही है।

ज्ञान वह है जो अभी अभी कह कर आए हैं :

1. परम स्वभाव ही ज्ञान है।

2. अहं रहितता ही ज्ञान है।

3. अदम्भ, अहिंसा ही ज्ञान है।

4. क्षमा, आर्जवता ही ज्ञान है।

5. निरासक्ति, समचित्तता ही ज्ञान है।

6. वैराग्य ही तो ज्ञान है।

7. अनन्य योगपूर्ण भक्ति ही तो ज्ञान है।

8. अध्यात्म ज्ञान ही तो ज्ञान है।

9. जीवन में परम सुख का आवाहन ही ज्ञान है, इत्यादि।

नन्हूं! यह ज्ञान जब जीवन में आये, तब कुछ कुछ ज्ञेय समझ आयेगा। भाई! ज्ञेय ज्ञान गम्य है, पर ज्ञान क्या है पहले यह समझ ले। यहाँ शब्द ज्ञान को ज्ञान नहीं कहा :

क) ‘झुकाव’ शब्द ज्ञान नहीं, झुक जाना ज्ञान है।

ख) ‘क्षमा’ शब्द ज्ञान नहीं, क्षमा करना ज्ञान है।

ग) प्रेम का शाब्दिक प्रवाह ज्ञान नहीं, प्रेम करना ज्ञान है।

घ) ज्ञान की चर्चा ज्ञान नहीं; ज्ञान वह होता है जो आपको ज्ञान की प्रतिमा बना दे।

ङ) अध्यात्म तो जीवन के प्रमाण से प्रमाणित होता है।

नन्हूं! जितना ज्ञान आपके जीवन में रूप धर ले, बस उतना ही ज्ञान आपको आता है। जो ज्ञान आपको केवल शब्द मात्र आता है, उसे अज्ञान ही मानना चाहिये। नन्हीं! जो ज्ञान आपके जीवन में न आये, वह निष्प्राण ही होता है। ज्ञान को सप्राण आप अपने प्राणों से ही कर सकते हैं, अपना सप्राण तन देकर ही कर सकते हैं। यदि ज्ञान सप्राण हो जाये तो जीवन परम में स्थित हो सकता है। आत्मा में स्थित हो सकता है। फिर जीवन में अनात्मा का त्याग हो ही जायेगा।

इस कारण भगवान यहाँ कहते हैं कि ज्ञान रूप साधनों से वह क्षेत्रज्ञ जाना जा सकता है। फिर कहते हैं कि वह ‘क्षेत्रज्ञ’ हृदय में स्थित है।

हृदय :

1. हृदय ही आत्मा तथा परमात्मा की उपलब्धि का स्थान माना जाता है।

2. हृदय मन बुद्धि से परे का स्थान है।

3. हृदय निरन्तर मौन का स्थान है।

4. हृदय में पहुँचने के लिए, पहले जीव को अपने मन तथा बुद्धि को शान्त करना ही होगा।

5. हृदय में पहुँचने के लिए जीव को पहले अपने चित्त को शुद्ध करना ही होगा।

6. हृदय में सोचने की शक्ति नहीं होती।

7. हृदय में ‘मैं’ की कोई जगह नहीं होती।

8. हृदय में दोष दर्शन की शक्ति नहीं होती।

9. हृदय में आरोपण की शक्ति नहीं होती।

10. हृदय में गुण गुमान की शक्ति नहीं होती।

11. हृदय में अभिमान की शक्ति नहीं होती।

12. हृदय में प्रतिद्वन्द्व की शक्ति नहीं होती।

13. हृदय में राग द्वेष की शक्ति नहीं होती।

नन्हीं! हृदय आत्मा का मौन निवास स्थान माना जाता है। भगवान कहते हैं कि आत्मा सबके हृदय में स्थित है।

नन्हीं! आत्म योग चाहुक याचिका! जो शाब्दिक परिभाषाएँ तूने पाई हैं,

क) उन्हें जीवन में उतार लेना ही ज्ञान है।

ख) उनकी प्रतिमा बन जाना ही ज्ञान है।

ग) यदि तुम्हारा तन उनकी प्रतिमा बन जाये तब वह ज्ञान सप्राण हो जाता है, क्योंकि आपका तन सप्राण है; वरना, यह ज्ञान केवल कल्पना मात्र रह जाता है।

इस कारण भगवान पहले बता आये हैं कि ज्ञान क्या है और अब कहते हैं कि उस ‘ज्ञेय’ को आप ज्ञान से जान सकते हैं। बिन उस ज्ञान के ज्ञेय को जानना असम्भव है। यानि, बिन उस ज्ञान की प्रतिमा बने, उस ज्ञेय को जानना असम्भव है।

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