Chapter 13 Shlokas 5, 6

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचरा:।।५।।

इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं संघातश्चेतना धृति:।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।।६।।

The five elements, the ego, the intellect, the unmanifest (the threefold energy of the gunas), the ten faculties of perception and action, the mind, the objects of the five sense organs, desire, hatred, joy, sorrow, the senses and the body constituted of the five elements, consciousness and dhriti;briefly, all these can be said to constitute the kshetra along with its modifications.

Chapter 13 Shlokas 5, 6

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचरा:।।५।।

इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं संघातश्चेतना धृति:।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।।६।।

The Lord says:

The five elements, the ego, the intellect, the unmanifest (the threefold energy of the gunas), the ten faculties of perception and action, the mind, the objects of the five sense organs, desire, hatred, joy, sorrow, the senses and the body constituted of the five elements, consciousness and dhriti;briefly, all these can be said to constitute the kshetra along with its modifications.

Bhagwan has elucidated the entire sphere of the kshetra.

a) The five elements, i.e. earth, water, fire, wind and ether;

b) The intellect i.e. the power of discernment;

c) The ego that prides itself on the attributes of the body;

d) The threefold power of Prakriti which creates all and imbues this entirety with attributes.

e) The ten sense organs i.e. five organs of perception – the eyes, ears, nose, tongue, sense of touch, and the five organs of action – the hands, feet, excretory faculty, generative organ, and the organ of speech.

f) The mind, i.e. the conglomeration of tendencies, the abode of positive and negative resolve, the instigator of likes and dislikes, and the repository of attachment giving rise to both enmity and friendship; the mind, which fills the sap of desire in the sense faculties; the mind which makes an individual a sage or a scoundrel: the individual is what his mind is.

g) The five objects of the senses; i.e. speech, touch, form, taste and smell.

h) Desire, hatred, happiness and sorrow, aversion and attachment – all of which are the source of varied attributes in the individual as a result of the attraction and the repulsion they generate.

i)  Dhriti connotes internal equipoise. It eradicates internal turmoil and generates stability. It lends support and establishes the one in whom it inheres. It is dhriti, this firmness of mind, which holds an individual internally and smoothens out the clashes between varied elements. It lends endurance to withstand sorrow. It becomes an inner courage that constantly aids the individual.

j)  Chetana or consciousness; without consciousness nothing is attainable. The power of consciousness fills the breath of life into the mortal frame.

1. This consciousness is the witness.

2. One can call it the reflection of the Supreme in man.

3. One may call it a speck of the Supreme Consciousness.

4. It is the power of the Supreme Witness.

5. It is the mainstay of the life breath in the individual.

6. One may call it the power of awakening in every fragment of a being.

Remember, the consciousness spoken of here is a mere awareness – a constituent of the Supreme Truth.

The Lord has described the entire kshetra. All this is inert, destructible and constituted of the three basic qualities.

अध्याय १३

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचरा:।।५।।

इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं संघातश्चेतना धृति:।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।।६।।

भगवान कहते हैं सुन!

शब्दार्थ :

१. पंच महाभूत, अहंकार और बुद्धि,

२. अव्यक्त, यानि त्रिगुणात्मिका शक्ति,

३. दस इन्द्रियाँ और एक मन,

४. पांच इन्द्रियों के विषय

५. और इच्छा, द्वेष, सुख, दु:ख,

६. देह, इन्द्रियाँ, तथा पंच तत्त्व समुदाय रूप तन,

७. चेतना तथा धृति,

८. यह विकार सहित संक्षेप में क्षेत्र कहा गया है।

तत्त्व विस्तार :

भगवान ने यहाँ पूरा क्षेत्र बता दिया। कहते हैं, इन सबसे मिल कर क्षेत्र बनता है।

क) पंच महा भूत, यानि पृथ्वी, जल, अग्न, वायु और आकाश।

ख) निर्णयात्मिका शक्ति रूपा बुद्धि।

ग) देह गुण अभिमानी अहंकार।

घ) त्रिगुणात्मिका शक्ति, जो रचना करती है और गुण भरती है।

ङ) दस इन्द्रियाँ यानि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ – नेत्र, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा और पांच कर्मेन्द्रियाँ, यानि हाथ, पांव, गुदा, लिंग और वाक्।

च) एक मन, यानि, वृत्ति पुंज मन, संकल्प विकल्प रूपा मन, रुचि अरुचि वर्धक मन, संगी मन, जो वैरी या मित्र बन जाता है, इन्द्रियों में रस भरने वाला मन। साधु यही बनता है और दुष्ट भी यही बनता है, जीव वही है जो उसका मन है।

छ) पंच इन्द्रिय गोचर विषय, अर्थात्, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध।

ज) इच्छा द्वेष, सुख दु:ख, राग द्वेष, जो अनेकों प्रकार के गुण उत्पन्न कर देते हैं जीव में, यह आकर्षण अथवा विकर्षण का कारण है।

झ) धृति, यहाँ आन्तरिक धृति को समझ! व्याकुलता मिटाने वाला गुण, स्थिरता देने वाला गुण, सहारा देने वाला गुण, स्थापित करने वाला गुण ही धृति है।

 धृति वही तो है जो अन्दर से थामे रखती है; जो विभिन्न तत्त्वों के आपस में भिड़ाव भी ठीक करती है, मन को दु:ख में धैर्य देती है, जो आन्तरिक साहस बन कर निरन्तर जीव का सहारा है।

ञ) चेतना – चेतना के बिना तो काम ही नहीं चल सकता। चेतना शक्ति प्राण भरती है।

1. साक्षीभूत चेतना ही तो है।

2. इसे परम का आभास कह लो।

3. इसे परम चैतन्य का अंश कह लो।

4. इसे परम दृष्टा की शक्ति कह लो।

5. इसे जीव में प्राण का आधार कह लो।

6. इसे हर अंश के जागरण की शक्ति कह लो।

याद रहे, यहाँ चेतना आभास मात्र, परम तत्त्व अंश दर्शाया गया है।

यहाँ भगवान ने पूर्ण क्षेत्र के लिये कह दिया, यह सब जड़ है, यह सब क्षर है, यह सब त्रिगुणात्मिका है।

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