Chapter 12 Shloka 18

सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संगविवर्जित:।।१८।।

  • “Who is alike to friend and foe, alike in honour and dishonour, happiness and misery, heat and cold and who is devoid of attachment. That devotee of Mine is dear to Me”.

Chapter 12 Shloka 18

सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संगविवर्जित:।।१८।।

Defining the attributes of His Beloved devotee the Lord says, “That devotee of Mine is dear to Me:

Who is alike to friend and foe, alike in honour and dishonour, happiness and misery, heat and cold and who is devoid of attachment.

Little one, the Lord speaks here of one who is impartial towards both friend and enemy and towards esteem and insult.

Shatru (शत्रु) – Enemy

1. An enemy is one who is a bitter opponent.

2. An enemy is one who is in the opposite camp.

3. An enemy is one who harbours venom in his heart.

4. An enemy is one who seeks to defeat and destroy the other.

Mitra (मित्र) – Friend

1. A friend is one who is supportive.

2. A friend is a well-wisher.

3. A friend is one who is an aide and a help.

4. A friend is one who offers refuge.

5. A friend is encouraging.

6. A friend is also a protector.

Little one, a friend is one who supports you and does all he can for the growth of your positive qualities.

Maan (मान) – Respect

1. Respect is another name for esteem.

2. It represents honour.

3. It is often equated with prosperity.

4. Little one, an individual generally considers praise of his body self to be respect.

5. An individual generally considers it to be a mark of honour to be able to claim his rights over others.

Apmaan (अपमान) – Disrespect

1. Disrespect also means dishonour.

2. Disrespect accorded by others is also an insult.

3. Disrespect includes scorn and contempt.

4. It can be a slur cast at one’s reputation.

5. Criticism is also considered a mark of disrespect.

Little one, those devotees who are dear to the Lord maintain their equanimity in the face of both respect and disrespect.

Sheeth (शीत) – Cold

Cold is also frigid, chilly. A human being can also be called ‘cold’ when he is indifferent and uncaring towards others.

Ushan (ऊष्ण) – Hot

‘Ushan’ connotes warmth, anger, and turbulence within. It also connotes sharpness.

The Lord says, “That devotee of mine is dear to Me, who remains in equanimity amidst all these dualities. He who has no attachment to all these dualities is indeed dear to Me.”

Little one, the Lord is expanding on the attributes of the devotee who is dear to Him. These are qualities of one who is eternally lost in the Lord.

By the word ‘lost’ one should not understand that such a devotee distances himself from the world and retires into solitude. In fact, it is only in normal day to day situations, in interaction with other people, that one can gauge the presence of all these qualities in an individual. It is only while living amongst enemies that one can learn to annihilate all feelings of animosity. One can discern an aspirant’s detachment towards honour and respect only when he is in a situation of dishonour. The Lord says, “He who remains equipoised in all these opposite situations, is infinitely dear to Me.”

अध्याय १२

सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संगविवर्जित:।।१८।।

अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताते हुए भगवान कहने लगे कि मुझे मेरे वह भक्त प्रिय हैं जो :

शब्दार्थ :

१. शत्रु (और) मित्र तथा मान अपमान में सम हैं,

२. तथा सर्दी, गर्मी, दु:ख सुख में सम हैं

३. और संग रहित हैं।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं! भगवान यहाँ शत्रु तथा मित्र में, और मान अपमान में समदृष्टि के विषय में कह रहे हैं।

शत्रु :

1. शत्रु भीषण विरोधी को कहते हैं।

2. शत्रु प्रतिपक्षी को कहते हैं।

3. शत्रु वैमनस्य रखने वाले को कहते हैं।

4. शत्रु वह होता है जो दूसरे का नाश कर देना चाहता है।

5. शत्रु वह होता है जो दूसरे को परास्त करना चाहता है।

मित्र :

1. मित्र सहयोगी को कहते हैं।

2. मित्र शुभ चिन्तक को कहते हैं।

3. मित्र सहायक को कहते हैं।

4. मित्र वह होता है जो सहारा दे।

5. मित्र वह होता है जो प्रत्युत्साहक हो।

मित्र आश्रयदाता को भी कहते हैं। मित्र संरक्षक को भी कहते हैं।

नन्हीं! मित्र वह होता है जो आपको स्थापित करे और जो आपके गुण वर्धन में आपका सहायक हो।

मान :

1. मान आदर को कहते हैं।

2. मान प्रतिष्ठा को कहते हैं।

3. मान सम्मान को कहते हैं।

4. मान समृद्धि को कहते हैं।

5. नन्हीं! जीवन में जीव अपने तन की महिमा गान और प्रतिष्ठा को अपना मान मानते हैं;

6. नन्हीं! जीवन में औरों पर अपना हक़ होने को वे अपना मान कहते हैं।

अपमान :

– अपमान अपयश को कहते हैं।

– अपमान अनादर को कहते हैं।

– अपमान तिरस्कार को कहते हैं।

– अपमान कलंक को कहते हैं।

– अपमान निन्दा को कहते हैं।

नन्हीं! भगवान के प्रिय भक्त मान अपमान में सम होते हैं।

शीत :

शीत सर्दी को कहते हैं।

शीत, जीव भी होते हैं जो दूसरों के प्रति उदासीन और लापरवाह होते हैं।

ऊष्ण :

– ऊष्णता गर्मी को कहते हैं।

– ऊष्णता क्रोध को भी कहते हैं।

– ऊष्णता उद्वेग को भी कहते हैं।

– ऊष्णता तीक्ष्णता को भी कहते हैं।

भगवान कहते हैं कि जो मेरे भक्त इन सब द्वन्द्वों में समचित्त रहते हैं, वे मुझे प्रिय हैं। जो इन सब द्वन्द्वों के प्रति संग नहीं रखते, वे मुझे प्रिय हैं।

नन्हूं! भगवान अपने प्रिय भक्त के चिन्ह बता रहे हैं। ये सब चिन्ह उसके हैं, जो निरन्तर भगवान में खोये रहते हैं।

खोये रहने से यह अर्थ न समझ लेना, कि वे दुनिया से दूर होकर कहीं एकान्त में बैठे रहते हैं, क्योंकि उनके सब चिन्हों का प्रमाण लोगों के सम्पर्क में ही मिल सकता है। शत्रुओं में रह कर ही जीव निर्वैरता का अभ्यास कर सकता है। मान के प्रति उदासीनता का प्रमाण अपमानपूर्ण परिस्थिति में ही मिल सकता है।

भगवान कहते हैं, ‘जो इन सब परिस्थितियों में सम रहते हैं, वे मुझे प्रिय हैं।’

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