Chapter 12 Shloka 15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:।।१५।।

He, who is never the cause of distress to anyone

and who is not offended by another,

who is free from elation, anger, fear and sorrow,

that one is dear to Me.

Chapter 12 Shloka 15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:।।१५।।    

Bhagwan says:

He, who is never the cause of distress to anyone and who is not offended by another, who is free from elation, anger, fear and sorrow, that one is dear to Me.

Little one, the Lord says that the devotee who is never a source of distress to any one, is dear to Him. First understand the meaning of ‘Udveg’(उद्वेग).

1. Such a one does not cause pain to anyone.

2. He never causes anyone fear.

3. He is never the cause of lamentation for another.

4. He is never instrumental in upsetting anybody.

5. He is not a source of remorse for anyone.

If people experience such negative emotions when in his presence, their distress is on account of their own ignorance. Such a one is ever serving all in complete self-forgetfulness; hence people’s agitation is due to some fault in their own mental make-up.

Little one, if the Lord Himself never endeavours to interfere with the concepts and beliefs of another, why would His beloved devotee attempt to do so? Just as the Lord identifies Himself with the other and never provokes another, how can His devotee aggravate others? The devotee endeavours to accept every being as a manifestation of the Lord. Therefore, he is not susceptible to provocation by another nor does he incite anybody himself.

Little one, such a devotee of the Lord is never enraged at another’s attack upon him because:

1. He knows that all that transpires is in accordance with the Lord’s cosmic law.

2. He knows that everyone is bound by the basic qualities of his nature and acts in accordance with those qualities. Any mistake made is therefore to be attributed to those qualities which have been created by Prakriti.

3. The Lord’s devotee is ever blissfully absorbed in the Lord’s Name. How then can he ever nurture sorrow or remorse?

Such a devotee is not even influenced by elation. He is ever joyous in His Lord. Elation and depression are caused by attaining or being separated from something and hence are dependent on external relationships and sense objects. The Lord’s devotee is never affected by these.

What can such a devotee of the Lord be afraid of?

a) His internal being is in constant contact with his Lord.

b) The Lord is his constant witness.

c) He is never separated from the One who is dearer to him than anything else in the world.

After this eternal union with his Beloved, he is not even afraid of death. The Lord says, “Such a devotee is infinitely dear to Me.”

अध्याय १२

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:।।१५।।   

भगवान् कहने लगे :

शब्दार्थ : 

१. जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता

२. और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता,

३. जो हर्ष, क्रोध, भय तथा उद्वेग से मुक्त है,

४. वह (भक्त) मेरे को प्रिय है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं! यहाँ भगवान कहते हैं कि उन्हें वह भक्त प्रिय है जो किसी को उद्वेग पूर्ण नहीं करता।

नन्हीं! पहले उद्वेग पूर्ण का अर्थ समझ ले!

क) वह किसी को दु:खी नहीं करता।

ख) वह किसी को भय पूर्ण नहीं करता।

ग) वह किसी को शोक पूर्ण नहीं करता।

घ) वह किसी को संतप्त नहीं करता।

ङ) वह किसी को क्षोभपूर्ण नहीं करता

यदि लोग उसके कारण ऐसे भाव को प्राप्त हो जायें तो अपनी अज्ञानता के कारण ही दु:खी होंगे। वह तो निरन्तर अपने आप को भूल कर सबकी सेवा करता रहता है। लोगों का उसके कारण संतप्त होना, उनकी किसी अपनी ही विकृति के कारण होगा।

नन्हीं! यदि भगवान स्वयं किसी की मान्यता का भंजन नहीं करते तो उनका भक्त यह कैसे कर सकता है? यदि भगवान स्वयं दूसरों के तद्‌रूप हो जाते हैं और किसी को भड़काते नहीं तो भगवान के भक्त कैसे किसी को भड़का सकते हैं? भक्त तो पूर्ण संसार को भगवान का रूप जानने का प्रयत्न करता है। इसलिए वह न किसी से उत्तेजित होता है और न ही किसी को उत्तेजित करता है।

नन्हीं! भगवान का भक्त किसी के प्रहार से भी नहीं भिड़ता, क्योंकि :

1. वह समझता है कि होगा वही जो भगवान ने विधान बनाया है।

2. वह मानता है कि जो दूसरे करते हैं वे गुण बंधे ही करते हैं और वह दोष प्रकृति रचित गुण का है; प्रकृति जड़ है, इस कारण किसी का भी दोष नहीं है।

3. भगवान का भक्त तो नित्य भगवान के नाम में मस्त रहता है। वह क्षोभ पूर्ण कैसे होगा?

ऐसे भक्त को हर्ष भी क्या होगा? वह तो भगवान में नित्य मुदित मनी रहता है। हर्ष या क्रोध तो विषय की उपलब्धि या वियोग से होता है। हर्ष या क्रोध तो बाह्य नातों या विषयों पर आधारित होते हैं। भगवान का भक्त इनकी परवाह नहीं करता।

फिर भगवान के भक्त को भय किस बात का?

क) भगवान से तो उसका आन्तरिक मिलन होता रहता है।

ख) भगवान का साक्षित्व भी उसके साथ निरन्तर होता है।

ग) उसको पूर्ण संसार से अधिक जो प्रिय है, उससे तो उसका वियोग कभी होता ही नहीं।

इस अखण्ड मिलन के पश्चात् उसे मृत्यु का भी भय नहीं रहता। भगवान कहते हैं, ‘ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।’

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