Chapter 12 Shloka 11

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रित: ।

सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् ।।११।।

If however, you are unable to

perform actions for My sake,

renounce the fruits of your actions,

keeping your mind in control

and with My Yoga as your mainstay.

Chapter 12 Shloka 11

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रित: ।

सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् ।।११।।

Bhagwan continues:

If however, you are unable to perform actions for My sake, renounce the fruits of your actions, keeping your mind in control and with My Yoga as your mainstay.

The Lord says, “If you consider your actions to be your own and you do not wish to dedicate them to Me, it does not matter.”

Renunciation of the fruits of action

1. Take support of My yoga and offer all the fruits of your actions unto Me.

2. With My nishkam yoga as your mainstay, surrender the fruits of your deeds to Me.

3. Perform all actions remembering Me alone and offer all the fruits of your actions to Me.

4. Remember that the fruits of your actions are, in any case, in My hands and therefore surrender them unto Me.

5. Perform all deeds with shrewdness and care and leave their fruits to Me.

It seems as though the Lord is saying:

a) You know My yogmaya – do you not?

b) You also know of My threefold energy comprising the potency of the three gunas or qualities.

c) These three gunas are to be found in all, and all are bound by these very gunas.

d) It is these qualities which attract some qualities and repel yet others.

e) In other words, it is gunas that spontaneously interact with other gunas.

f) You are therefore never able to know what fruits shall sprout from which deed.

g) You can also never be sure that you will receive any fruits at all!

­­–  Knowing this, offer all the fruits of your actions unto Me.

­­–  Leave victory and defeat to Me.

­­–  Leave success and failure to Me.

Fix firmly in your mind that:

1. All I am telling you is the truth – and cease to look for the fruits of your deeds.

2. I abide in complete identification and yoga with you.

3. I will always protect you Myself.

a) I am the Truth.

b) Therefore all your interactions within what you consider to be the Truth are interactions performed within Me.

c) You know the truth of My yoga in life, inculcate that much in your life.

The Lord has said, “Take the support of My yoga and renounce the fruits of all your deeds.” With whom is this yoga?

The yoga of the individual is with the Lord. The Lord has spoken earlier about His yoga with maya. It is through this yoga of the Lord that this entire creation was wrought. It is the knowledge of this yoga to which the Lord is referring.

Who knows which quality will conjoin with which other quality and thus render the fruit of a third quality! Therefore do not keep your eye on the fruits of deeds. Leave them to the Lord and you will erase the cause of many a sorrow.

The Lord has said here, “With your mind under control, renounce the fruits of deeds unto Me.”

Little one, this entire knowledge is being imparted to:

1. One who stands steadfast in the Truth and who is replete with divine attributes, ever engaged in the performance of his duty.

2. Arjuna, who was ever subservient to his duty.

3. One who bowed humbly before his elders.

4. One who was the well-wisher of all.

5. Arjuna who possessed a magnanimous heart.

6. A courageous warrior.

7. One whose mind was in his control.

The Pandavas knew how to endure adversity and had learned to tolerate it in their lives. However, they were still attached to their actions and to the fruits thereof.

The individual is afraid of the consequences of his actions and is yet attached to those fruits. Therefore the Lord says, “Leave the fruits of your actions to Me, and your fears and anxiety will cease.”

अध्याय १२

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रित: ।

सर्वकर्मफलत्यागं तत: कुरु यतात्मवान् ।।११।।

अब सुन! भगवान कहते हैं, अच्छा चल।

शब्दार्थ:

१. गर कर्म भी मुझ पर अर्पित नहीं कर सकता,

२. तो मेरे योग का आश्रय लिये हुए,

३. अपने मन को संयम में रखता हुआ सारे कर्मों के फल का त्याग कर दे।

तत्व विस्तार :

भगवान कहते हैं, ‘अगर कर्म अपने समझता है और वह मुझे अर्पण नहीं करना चाहता तो कोई बात नहीं।’

कर्मफल त्याग :

1. तू मेरे योग का आसरा लेकर अपने कर्मों का फल मुझ पर अर्पण कर दे।

2. तू मेरे निष्काम योग का आसरा लेकर अपने कर्मों का फल मुझ पर अर्पण कर दे।

3. तू मुझे याद करता हुआ कर्म कर और अपने कर्मों का फल मुझ पर अर्पण कर दे।

4. तू याद रख कि कर्म फल मेरे हाथ में है और अपने कर्मों का फल मुझ पर अर्पण कर दे।

5. तू सावधानी तथा दक्षता से कर्म कर और अपने कर्मों का फल मुझ पर अर्पण कर दे।

मानो भगवान कह रहे हों :

क) तू मेरी योग माया को जानता है न!

ख) तू मेरी त्रिगुणात्मिका शक्ति को जानता है न!

ग) सब में गुण भरे हैं और सब गुण बंधे हैं, तू जानता है न!

घ) फिर गुण ही किसी गुण को आकर्षित करते हैं और किसी को विकर्षित भी करते हैं!

ङ) यानि, गुण गुणों में स्वत: वर्त रहे हैं!

च) फल कहीं से क्या मिले, यह तो तुम नहीं जानते !

छ) फिर मिले, या न भी मिले, यह कौन कह सकता है?

– यह जानते हुए तुम कर्म फल मुझ पर अर्पित कर दो।

– जय पराजय मुझ पे छोड़ दो।

– सिद्धि असिद्धि मुझ पे छोड़ दो।

मन में इतना तो धारण कर लो कि :

1. जो मैं कहता हूँ यह सत् है और कर्म फल से दृष्टि हटा ले ।

2. मैं तुमसे भी योग किये बैठा हूँ।

3. तुम्हारा संरक्षण मैं करूँगा ही ।

क) मेरा नाम सत् है।

ख) तू जिसे सत् मानता है और जीवन में वर्तता है, वह मुझ में ही वर्तता है।

ग) यह मेरे योग का सत् तो तू जीवन में जानता ही है, तो अभी इतना ही जीवन में ले आ।

देख यूँ समझ! भगवान ने कहा, ‘मेरे योग का आसरा लेकर सारे कर्मों के फल का त्याग कर दे।’ योग किससे होता है?

जीव का योग तो भगवान से होता है, भगवान का योग किससे होता है? भगवान योग माया की बात कह आये हैं, भगवान के योग से ही सारी रचना रची जाती है। यहाँ उस योग के ज्ञान की बात है।

कौन गुण किस गुण से मिल कर फल स्वरूप क्या उत्पन्न कर देगा, यह कौन जाने? इसलिये फल पे ध्यान मत रख, फल भगवान पे छोड़ दे, तेरे अनेकों दु:ख मिट जायेंगे।

भगवान ने यहाँ कहा कि तू वश में किए हुए चित्त वाला, कर्मों के फल मुझ पर त्याग दे।

नन्हीं! यह सम्पूर्ण ज्ञान भगवान एक :

क) सत्त्व स्थित, दैवी गुण सम्पन्न तथा कर्तव्य परायण सखा को दे रहे हैं।

ख) कर्तव्य के सम्मुख नित्य झुकने वाले अर्जुन को दे रहे हैं।

ग) बड़ों के सम्मुख नित्य झुकने वाले को दे रहे हैं।

घ) अखिल हितैषी को दे रहे हैं।

ङ) उदार हृदय वाले अर्जुन को दे रहे हैं।

च) महावीर धनुर्धारी को दे रहे हैं।

छ) अपने चित्त को वश में रखने वाले को दे रहे हैं।

पाण्डवों को विपरीतता को सहना और विपरीतता में रहना आता था, किन्तु यह सब होते हुए भी वह कर्मों से और कर्मों के फल से संग करते थे।

जीव कर्मों के फलों से डरता भी है, किन्तु कर्मों के फलों से आसक्त भी है।

सो भगवान कहते हैं, ‘कर्म फल मुझपे छोड़ दे तो तेरी घबराहट बन्द हो जायेगी।’

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