Chapter 12 Shloka 10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

If you are unable to practice Yoga,

concentrate on Me by performing actions

for My sake. You can attain perfection

even by thus performing actions for Me.

Chapter 12 Shloka 10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

Look how the Lord is descending to meet His devotee at the latter’s level. He says:

If you are unable to practice Yoga, concentrate on Me by performing actions for My sake. You can attain perfection even by thus performing actions for Me.

Bhagwan says, “Even if you do not have such deep love for Me and you cannot fix your mind in Me through practice, it does not matter. There is yet another alternative:

1. Dedicate all your actions to Me.

2. Perform all those deeds thinking of Me.

3. Offer all your deeds to Me in secret.

4. Fill your deeds with My name.”

It seems as though the Lord is standing with hands folded before his devotee:

a) “Remember Me in any way whatsoever!

b) Keep Me with you somehow.

c) Do not leave My hand.

d) Do anything, but never sever your relationship with Me.

e) Make Me your companion! I am your very own!

Why do you not claim Me as yours? I shall only do good by you. I shall take you towards the Supreme.”

This is the glory of the Lord’s Name. If you take His Name, you will only do good. It is difficult to harm anyone with the Lord’s Name in your heart! If you take the Lord’s Name, your life will automatically become an offering to Him and each act performed by you, an act of yagya.

And listen! The Lord Himself beseeches you, “Listen to Me!” How many methods the Lord uses to persuade Arjuna! How simple He is making it for Arjuna to unite with Him!

Little one, witness the Lord’s utter humility – His sincerity.

Just watch by what means He persuades his friend. What can one say about That One who is indeed the Servant of His servant? The true devotee of wisdom becomes silent with amazement at this spectacle of the Lord’s humility.

अध्याय १२

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

देख! भगवान अपने भक्त के लिए कहाँ से कहाँ उतर रहे हैं।

अब कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. यदि तू परम मिलन रूप अभ्यास करने में भी असमर्थ है तो मेरे अर्थ कर्म परायण होकर मुझमें मग्न हो जा।

२. मेरे अर्थ कर्म करता हुआ भी तू सिद्धि को प्राप्त होगा।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहते हैं, ‘अच्छा! यदि तुझे मुझसे प्रगाढ़ प्रेम नहीं है, यदि अभ्यास से भी तुम्हारा चित्त मुझमें नहीं लगता, तो कोई बात नहीं। तू जीवन में जो भी कर्म करता है,

1. वह मुझ पर अर्पित करता जा।

2. वह मेरे परायण होकर कर।

3. वह चुपके से मुझे देता जा।

4. उसमें मेरा भी नाम भर दे।’

भगवान मानो अपने भक्त के कारण हाथ जोड़ कर कह रहे हैं,

क) ‘किसी विधि मुझे याद तो रख!

ख) किसी विधि मुझे साथ तो रख!

ग) किसी विधि मेरा हाथ मत छोड़!

घ) कुछ कर ले, पर मुझसे नाता न तोड़!

ङ) मुझे अपना साथी बना ले न! मैं तुम्हारा ही हूँ।

तुम क्यों नहीं मुझे अपना लेते? मैं तेरा कल्याण ही करूँगा, तुझे परम की ओर ही ले चलूँगा।’

भगवान के नाम की यही महिमा है। भगवान का नाम लेकर शुभ ही करोगे। भगवान का नाम लेकर किसी की क्षति करनी कठिन है। भगवान का नाम लिया, तो यज्ञ आरम्भ हो ही जाएगा।

और देख! भगवान स्वयं कह रहे हैं, ‘मान लो न!’ कैसे विविध विधि भगवान स्वयं मना रहे हैं अर्जुन को! अपने आप से मिलना कितना सहज किये जा रहे हैं!

नन्हीं! भगवान का झुकाव देख! भगवान का मिटाव देख! भगवान की वफ़ा देख!

देख तो सही! अपने सखा को कैसे मनाते हैं भगवान! ऐसे दासन् के दास को देख कर कोई क्या कहे? इस कारण ज्ञानी भक्त मौन ही रह जाते हैं और आश्चर्य चकित हुए देखते रह जाते हैं।

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