Chapter 11 Shloka 51

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।।

इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत:।।५१।।

Arjuna said:

O Krishna, Chastiser of mortals!

I have now become self-composed

and have returned to my natural state

upon witnessing this benign, human form of Yours.

Chapter 11 Shloka 51

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।।

इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत:।।५१।।

Upon witnessing the Lord’s benign demeanour and human form similar to his own, Arjuna said:

O Krishna, Chastiser of mortals! I have now become self-composed and have returned to my natural state upon witnessing this benign, human form of Yours.

Little one, listen to Arjuna’s words. Now that he is witnessing the Lord as an ordinary human being, he is again at peace and says:

a) O Lord, I have now regained my consciousness.

b) I have now come to my senses.

c) I am now at peace.

d) I am now free of my agony.

e) I have at last ceased to tremble.

f) I have become fearless.

Little one, listen! Now that the Lord has reassumed the form of a simple human being, Arjuna is once more at peace and happy. Yet, Arjuna addresses the Lord as ‘Janardhana’ (जनार्दन)!

1. You are the one who inflicts punishment on people.

2. You give pain to people.

3. You trouble people.

4. You torment people.

5. You destroy people.

Look little one, Arjuna is not troubled when all this happens to others; however, when he himself is the recipient, he begins to feel perturbed, and finds it difficult to accept the fearsome form of the Lord.

This is what generally happens in the world too. The individual worships the Lord only as long as he feels that the Lord will support him. When misfortune befalls others he simply says, “This was their destiny.” When that same misfortune befalls him he feels tormented, and turns against the Lord.

This is the basic difference between a sadhu – a man of virtue, and an ordinary man. The sadhu smiles when he is personally afflicted by trouble or pain, but is ready to give even his life to alleviate the other’s pain.

अध्याय ११

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।।

इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत:।।५१।।

सौम्य रूप और अपने समान तनधारी भगवान को देख कर अर्जुन बोला :

शब्दार्थ:

१. हे लोगों को दण्ड देने वाले कृष्ण!

२. तेरे इस सौम्य मनुष्य रूप को देख कर,

३. अब मैं सचेत हुआ हूँ

४. और अपनी प्रकृति को प्राप्त हुआ हूँ।

तत्त्व विस्तार :

देख नन्हीं! अर्जुन क्या कहते हैं। जब भगवान अर्जुन को अपने समान साधारण से पुरुष दिखने लगे, तब उसे चैन आई और वह कहने लगा, ‘हे भगवान !

क) अब मैं सचेत हुआ हूँ।

ख) अब मुझे होश आई है।

ग) अब मैं शान्त हो गया हूँ।

घ) अब मैं व्याकुलता रहित हो गया हूँ।

ङ) अब मेरा कांपना बन्द हो गया है।

च) अब मैं निर्भय हो गया हूँ।

नन्हीं देख! जब भगवान ने पुन: भोला भाला रूप धरा तब अर्जुन शान्त हो गये। जब भगवान ने पुन: सुख देने वाला रूप धरा तो अर्जुन शान्त हो गये; किन्तु अर्जुन स्वयं भगवान को कह रहे हैं कि, ‘हे जनार्दन!

1. तुम लोगों को दण्ड देने वाले हो।

2. तुम लोगों को पीड़ा देने वाले हो।

3. तुम लोगों को सताने वाले हो।

4. तुम लोगों को तपाने वाले हो।

5. तुम लोगों का नाश करने वाले हो।

देख नन्हीं! जब यह सब भगवान दूसरों से करें तो ठीक है, तब तो अर्जुन नहीं घबराते। जब अपने पर बीतने लगे, तब वह घबरा जाते हैं और भयभीत हो जाते हैं।

संसार में होता भी यही है। भगवान को जीव तब तक ही ध्याता है जब तक उसे यह लगे कि भगवान उसके अनुकूल हैं। जब लोगों पर विपदा आ जाये तब तो वह कह देते हैं

साधारण जीव में और साधु में यही भेद होता है। साधु के अपने ऊपर जब विपदा आये, तो वह मुसकरा कर उसे भगवान की लीला मान लेते हैं और जब कोई दूसरा दु:खी हो तो उसके दु:ख निवारण अर्थ अपनी जान लड़ा देते हैं।

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