Chapter 11 Shloka 30

लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भि:।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो।।३०।।

O Vishnu! You are licking and swallowing

all the realms from all sides.

Your blazing effulgence is

illuminating and scorching

the entire world with its fiery glow.

Chapter 11 Shloka 30

लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भि:।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो।।३०।।

Describing the Lord’s blazing countenance, Arjuna said:

O Vishnu! You are licking and swallowing all the realms from all sides. Your blazing effulgence is illuminating and scorching the entire world with its fiery glow.

My dear, this is what life is. Why confine yourself to words? Understand the meaning behind the words.

a) We are all progressing towards death.

b) We are all ultimately merging in That Supreme One.

c) This body of ours can be regarded as ‘food’ prepared from the five elements.

d) The earth shall inevitably reclaim its own element.

e) The wind shall take back the element of wind that is an integral part of our body.

f) The water shall reclaim its own constituent from within us.

Our meeting with this body is for but a short period. Live as you wish. Do you wish to perform tapas and transcend the ‘I’ or do you wish to burn in the flame of desire and individuality? It is for you to decide.

1. Do you wish to be a Yogi who has attained union with the Self or a bhogi who engages in desire fulfilment?

2. Do you wish to be a loving devotee or do you wish to fan the flame of attachment?

3. Do you aspire for virtue or for demonic qualities?

4. Do you wish to attain immortality or remain enmeshed in mortality?

5. Do you wish to attain knowledge or do you wish to retain your ignorance?

Do whatever pleases you.

The Lord is revealing the cycle of life.

Tapas

1. Glorification of the Lord is tapas; the desire for identification with the Atma Self is tapas.

2. The attribute of endurance is also tapas; tapas can also mean to heat or trouble another.

3. The tapasvi silently endures all; adversity singes the one who remains distant from the Divine Essence.

4. When man remains ignorant of the eternal nature of the Atma and the inevitability of death, he is scorched by the vagaries of the world.

He who renounces the body whilst still alive, transcends death. He remains untouched by this material creation. He attains the Self. He attains the Atma Itself.

Arjuna has called the Lord ‘Vishnu’. This is the benevolent manifestation of the Lord. Lord Vishnu is the protector and sustainer of the world and the fulfiller of myriad desires.

Arjuna is more or less saying, “O Sustainer of the world, O Protector of the world! O benevolent and compassionate One! O Image of mercy and love Vishnu! I cannot fathom this gruesome manifestation of Yours. You are chewing the people of all the worlds with your teeth. You are drinking their blood. You are licking them and then swallowing them. I cannot understand this aspect of Yours at all.”

Abha and Kamla, listen!

1. All beings consider the Lord to be the embodiment of benevolence.

2. They know Him as One who grants boons.

3. They consider Him to be the One who grants joy.

4. They know Him to be the Supreme Protector.

It becomes difficult for them to understand that He is death; He is justice; He is the Bestower of sorrow and pain as well as the Endower of the fruits of action – joy and grief. This is precisely Arjuna’s dilemma.

अध्याय ११

लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भि:।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो।।३०।।

भगवान के तेजोमय मुख का वर्णन करते हुए अर्जुन कहने लगे,

शब्दार्थ :

१. हे विष्णु! आप अपने प्रज्वलित मुख से,

२. चारों ओर से समस्त लोकों को

३. ग्रसन करते हुए चाट रहे हैं।

४. आपका उग्र प्रकाश,

५. सम्पूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके, तपायमान कर रहा है।

तत्त्व विस्तार :

यही है ज़िन्दगी मेरी जान्!

शब्दों पर क्यों जाती हो, शब्दों के पीछे निहित तत्त्व सार समझो।

क) हम सब मृत्यु की ओर जा रहे हैं।

ख) हम सब उस परम में ही समा रहे हैं।

ग) हमारा तन भी पंच तत्त्वों का भोजन है।

घ) धरती ने धरती तत्त्व वापस ले ही लेना है।

ङ) वायु ने वायु तत्त्व वापस ले ही लेना है।

च) जल ने जल तत्त्व वापस ले ही लेना है।

कुछ पल का हमारा साथ है इस तन से, जो चाहो, ज्यों चाहो जी लो! तप करना है, या तपना है, यह तुम्हारी इच्छा है।

आपने,

1. योगी बनना है या भोगी बनना है,

2. भक्त बनना है या आसक्त बनना है,

3. सुर बनना है या असुर बनना है,

4. अमरत्व पाना है या मृत्यु को पाना है,

5. ज्ञान पाना है या अज्ञान पाना है,

यह सब आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। जो चाहते हो कर लो।

जीवन चक्र का स्वरूप यहाँ दिखा रहे हैं भगवान!

तप :

– भगवद् भजन तप ही है, आत्म तत्त्व से तद्‍रूपता की चाह तप है।

– तप सहनशक्ति को भी कहते हैं, तप तपाने को भी कहते हैं।

– तपस्वी मौन रह कर सब कुछ सह लेता है।

भगवद् तत्त्व से दूर रहने वाले को विपरीतता तपाती है और दु:खी कर देती है।

जब जीव आत्मा की नित्यता तथा मृत्यु की निश्चितता को नहीं पहचानता, वह तपायमान होता है।

जो जीते जी तन को छोड़ देता है, वह मृत्यु से भी तर जाता है। वह लिपायमान नहीं होता, वह तो स्वयं आत्म स्वरूप बन जाता है।

यहाँ अर्जुन ने भगवान को ‘विष्णु:’ (१०/२१, ११/४६ देखिये) कहकर पुकारा। विष्णु भगवान का सौम्य अंश है। विष्णु तो जग के संरक्षक, पालन पोषण कर्ता तथा विभिन्न चाहनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

यहाँ अर्जुन मानो भगवान से कह रहे हों :

‘हे सृष्टि को पालने वाले, हे सृष्टि का संरक्षण करने वाले, हे सौम्य रूप तथा करुणा पूर्ण, हे दया तथा वात्सल्य की मूर्त, इन सब गुणों के पुंज विष्णु!

– यह तुम्हारा विकराल रूप मुझे समझ नहीं आ रहा है।

– तुम इन सम्पूर्ण लोगों को अपने दांतों में चबा रहे हो।

– इन सम्पूर्ण लोगों का रक्त पान कर रहे हो।

– तुम इन सम्पूर्ण लोगों को ग्रसते हुए अपनी जीभ से चाट रहे हो।

– तुम्हारी यह बात मुझे तनिक भी समझ नहीं आ रही है।’

नन्हीं तथा नन्हीं की माँ कमला! जीव भगवान को सदा :

क) सौम्य मूर्त समझते हैं।

ख) वरदान देने वाला समझते हैं।

ग) सुख देने वाला समझते हैं।

घ) संरक्षक रूप समझते हैं।

उनके लिये यह समझना कठिन हो जाता है कि मृत्यु भी वही हैं, न्याय भी वही हैं, दु:ख दर्द और तड़प भी वही देते हैं, वास्तव में कर्म फल चक्र भी तो वही हैं। कर्म फल के रूप में जो सुख दु:ख मिलते हैं वह भी तो वही हैं।

अर्जुन की भी यही समस्या थी।

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