Chapter 11 Shlokas 28, 29

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा: समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।२८।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा:।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा:।।२९।।

Just as myriad rivers rush towards the sea,

 so also, these warriors of the mortal world 

are entering Your flaming mouth. Just as moths

enter the burning flame with full speed

only to get destroyed, so also these entire worlds

 enter Your mouth, hurtling towards extinction.

Chapter 11 Shlokas 28, 29

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा: समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।२८।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा:।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा:।।२९।।

Now Arjuna observes further:

Just as myriad rivers rush towards the sea, so also, these warriors of the mortal world are entering Your flaming mouth. Just as moths enter the burning flame with full speed only to get destroyed, so also these entire worlds enter Your mouth, hurtling towards extinction.

Little one, Arjuna says here:

a) Just as myriad rivulets rush towards the sea with great force, so also these courageous warriors of the mortal world are entering Your flaming mouth.

b) Just as moths enter the fire only to meet with their death, so also all these people are swiftly running towards You to be destroyed.

Arjuna’s first comparison is of rivers rushing to the ocean with people who take pride in their courage, and thus hasten towards their extinction, bound by their attributes. The Kshatriya tendencies of such people draw them towards the ocean of death, which they enter joyously, led by their love of war.

So also others are drawn towards death like a moth is drawn towards a fire:

1. Both are bound irrevocably by their innate qualities.

2. Both are progressing in accordance with the cycle of Prakriti.

3. The mortal body seems to thus seek its end.

However, moths and other such insects are blind, whereas the man of courage enters the fire of death knowingly. Arjuna included the principle warriors of the Pandava army in this gathering of gallant warriors. He is still perceiving the Lord in His immense, cosmic form and repeats that all these people are entering His flaming mouth.

Little one, Brahm or the Supreme Atma Self is unparalleled and an indivisible whole. However,

a) Arjuna is witnessing people dwelling on different planes of existence entering That One – he perceives all this in accordance with his own concepts.

b) Arjuna does not yet fully believe that, That One is whole and complete.

The Lord has already stated that He does not erode the faith of others – He simply strengthens their faith in the object of their faith.

Arjuna was firmly established in the quality of sattva and was deeply attached to that quality. He could accept all the Lord’s benevolent and good qualities but he could not impute any negative qualities to Him. He was thus extremely agitated at seeing this fierce aspect of the Lord, and mentally began to separate that form from the divinity which he acknowledged. He could thus see all these beings enter the Lord and he also perceived them being annihilated in the Lord’s gruesome form – however, he could not accept that all this was also the Lord.

अध्याय ११

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा: समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।२८।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा:।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा:।।२९।।

अब अर्जुन आगे देखते हुए कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जैसे नदियों के बहुत से जल प्रवाह समुद्र की ओर मुख किए हुए दौड़े जाते हैं,

२. वैसे ही यह नर लोक के वीर आपके प्रज्वलित हुए मुख में प्रवेश करते हैं।

३. जैसे पतंगे नष्ट होने के लिए पूर्ण वेग से प्रज्वलित ज्वाला में प्रवेश करते हैं,

४. वैसे ही ये सब लोक भी आपके मुख में अति वेग से, अपने नाश अर्थ प्रवेश कर रहे हैं।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं! यहाँ अर्जुन कह रहे हैं कि :

क) ज्यों नदियाँ अति वेग से समुद्र की ओर भागी जाती हैं, वैसे ही नरलोक के वीर पुरुष आपके प्रज्वलित मुख में प्रवेश कर रहे हैं।

ख) जैसे पतंगे अग्नि में नाश होने के लिये भागे जाते हैं, वैसे ही सब लोग आप में अपने नाश के लिए भागे आ रहे हैं।

पहला दृष्टांत अर्जुन ने जड़ नदियों से समतुलना करके दिया और कहा कि वीरता अभिमानी लोग अपने सहज गुणों से बंधे हुए अपनी मृत्यु की ओर जा रहे हैं। यानि, उनका क्षत्रिय गुण तथा बल का गुण उनको सहज ही मृत्यु रूपा महासागर की ओर लिए जा रहा है। वीरों को मानो उनकी युद्ध प्रियता ही युद्ध की ओर खेंच लेती है। वे वीर लोग खुशी से मृत्यु की ओर जाते हैं।

वैसे ही अन्य लोग भी पतंगों की तरह अपनी मौत की ओर जा रहे हैं। दोनों ही, यानि, कीट, पतंग तथा वीर पुरुष मृत्यु की ओर जा रहे हैं।

नन्हीं!

1. दोनों ही गुणों से बन्धे हैं।

2. दोनों को ही गुण विवश खेंचे लिये जा रहे हैं।

3. दोनों ही प्रकृति के चक्र में बढ़ते जा रहे हैं।

4. ऐसे लगता है कि मृत्यु धर्मा तन अपनी मृत्यु की तलाश कर रहा हो।

किन्तु कीट पतंग पूर्णतय: अन्धे होते हैं और वीर पुरुष जान बूझ कर मृत्यु की ओर जाते हैं।

इन वीर पुरुषों में पाण्डव सेना के मुख्य योद्धा गण भी थे।

नन्हीं! अर्जुन भगवान को अभी भी महा विशाल तन धारी के रूप में देख रहे हैं तथा यही कह रहे हैं कि ये सब लोग भगवान के प्रज्वलित मुख में प्रवेश कर रहे हैं।

नन्हीं! ब्रह्म, यानि परम आत्म स्वरूप तो अद्वितीय तथा अखण्ड एक हैं, किन्तु

क) अर्जुन अपनी मान्यता के अनुसार विभिन्न लोकों के लोगों को उनके अन्दर जाते देख रहा है।

ख) अर्जुन अभी भी यह नहीं मान सका कि ‘पूर्ण’ पूर्ण ही होता है।

भगवान कह कर आये हैं कि मैं किसी की श्रद्धा को भंजित नहीं करता, बल्कि उसकी श्रद्धा को उसी के श्रद्धास्पद मैं और भी दृढ़ कर देता हूँ।

अर्जुन सतो गुण से संग करने वाला सतो गुण में स्थित था। वह पूर्ण श्रेष्ठ गुण तो भगवान के मान सकता था पर दुर्गुण भगवान पर आरोपित नहीं कर सकता था। ऐसा भयंकर रूप देख कर वह घबरा गया और ऐसे भयंकर रूप को भगवान से कुछ कुछ भिन्न देखने लगा। इन सब लोगों को भगवान के अन्दर जाते तो देखा और भगवान के उग्र रूप में भस्म होते तो देखा, किन्तु ये सब भगवान ही हैं, यह नहीं समझ सका।

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