Chapter 11 Shloka 12

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।१२।।

If a thousand suns burst forth in the sky,

their combined effulgence

would hardly approach

the splendour of that Supreme Lord.

Chapter 11 Shloka 12

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।१२।।

Sanjay says:

If a thousand suns burst forth in the sky, their combined effulgence would hardly approach the splendour of that Supreme Lord.

Little one, listen to what Sanjay says! “Even the combined effulgence of a thousand suns could not match the luminescence of the Lord.”

Comparing the Lord with the sun

Sanjay seems to be saying:

a) What befitting simile can I give of that divine, incomparable Essence, when none exists!

b) How can I explain the effulgence of that celestial Essence and Its infinite form?

c) How can the Infinite be defined by limited words and yet remain boundless?

d) With what shall I compare the luminescence of that Supreme One who is Light Itself?

e) Perhaps the only simile that might somewhat describe the radiance of that Supreme Purusha, would be that of thousands of suns rising simultaneously.

f) How can I bind the Incomprehensible Essence in thought?

Little one! That Eternal Essence, that Light of Spirituality, cannot be compared with anything in existence other than a simile. That which is indestructible cannot be described by the destructible. No number of suns can compare with that Supreme Effulgence, for they are but a fraction of the creation of Brahm.

The secret of Advaita or Non-duality

Little one, understand this carefully. In the tenth chapter the Lord has explained “All is I”; He has placed before us a method whereby we can meditate on that Truth. Whoever comes before you, if you interact with him knowing him to be imbued with the Lord Himself, you will gradually practice the maxim ‘Vaasudevam Idam Sarvam’ – ‘All this is Vaasudeva’ (‘Vaasudeva’ is an epithet of the Lord).

In this chapter, the Lord is displaying everything ‘within Himself’. Thus He is clarifying that whatsoever exists, exists within the Atma.

If you too renounce the body idea and the body related intellect and let yourself be absorbed in the Atma, you too will perceive the world as existing within you. The world will retain no other meaning for you. Naught shall exist without you.

The Lord speaks here of complete Advaita or non-duality. Just as the dream faculty of the dreamer conjures up an entire dream sequence, taking the form of all the characters of the dream, enacting each one’s part, similarly this entire creation is the dream sequence of the Atma. Then, just as when the person awakens from his dream, the dream faculty along with all the characters it created is reabsorbed into his consciousness, so also the entire world is reabsorbed into the Atma.

This is the truth that the Lord is trying to explain.

अध्याय ११

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।१२।।

संजय कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. आकाश में हज़ारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न हुआ हो,

२. वह उस महात्मा के प्रकाश के सदृश शायद ही हो।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! देख संजय क्या कहते हैं! ‘हज़ारों सूर्य भी यदि एक साथ उदय हो जायें, तब भी भगवान के प्रकाश के सदृश शायद ही हों।’

भगवान की उपमा सूर्यों के साथ :

संजय मानो कह रहे हों कि,

क) उस दिव्य अनुपम तत्व की कोई उपमा हो तो दूँ!

ख) उस दिव्य स्वरूप, अनन्त रूप की ज्योति को कैसे समझाऊँ?

ग) असीम को किन शब्दों में सीमित करूँ कि वह फिर भी असीम रहे?

घ) इस दिव्य परम प्रकाश स्वरूप के प्रकाश की तुलना किससे करूँ?

ङ) इस अलौकिक प्रकाश घन को कैसे प्रकट करूँ?

च) परम पुरुष पुरुषोत्तम के प्रकाश की तुलना शायद ही हज़ारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से हो सके।

छ) उस अचिन्त्य तत्व को चिन्तन में कैसे बान्धूँ?

नन्हीं! वास्तव में बात भी कुछ ऐसी ही है! उस नित्य, अध्यात्म प्रकाश स्वरूप की किसी से तुलना हो भी नहीं सकती। जो अखण्ड ही हो, उसकी तुलना करोगे भी तो किससे? जितने मर्ज़ी सूर्य एकत्रित कर लो, वह उस ब्रह्म के अंश मात्र ही तो होंगे।

अद्वैत का राज़ :

नन्हीं! ज़रा ध्यान लगा कर समझ! दसवें अध्याय में भगवान कह कर आये हैं, ‘सब मैं ही हूँ’, मानो वहाँ भगवान निरन्तर ध्यान लगाने की विधि कह कर आये हैं। जो भी आपके सामने आये, यदि उसमें भगवान को जान कर आप उससे वर्तेंगे, तो शनै: शनै: ‘वासुदेवमिदंसर्वम्’ का अभ्यास होने लग जायेगा।

यहाँ भगवान सब कुछ अपने आन्तर में दर्शा रहे हैं, मानो कह रहे हों कि जो कुछ भी है, आत्म स्वरूप के आन्तर में है।

यदि आप भी अपने तनत्व भाव तथा देहात्म बुद्धि का त्याग कर दें और आत्म तत्त्व में विलीन हो जायें, तो आपके लिये भी जग आप ही में दर्शायेगा और संसार इसके अतिरिक्त कोई अर्थ नहीं रखेगा। फिर आपके बिना कुछ रह ही नहीं जायेगा।

यहाँ भगवान अखण्ड अद्वैत की बात कर रहे हैं। ज्यों स्वप्न द्रष्टा की स्वप्नाकार वृत्ति ही सम्पूर्ण स्वप्न को रच लेती है और स्वप्न में जितने भी रूप होते हैं, वह स्वयं ही धर लेती है, स्वप्न के हर जीव का अभिनय स्वयं ही कर लेती है, वैसे ही मानो यह संसार आत्मा का स्वप्न रूप है। फिर जब जीव जाग जाता है, तब जैसे वह स्वप्नाकार वृत्ति पुन: सम्पूर्ण नटों के सहित स्वप्न द्रष्टा में समा जाती है, वैसे ही सम्पूर्ण संसार आत्मा में विलीन हो जाता है।

भगवान यहाँ यही तत्त्व समझा रहे हैं।

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