Chapter 10 Shloka 32

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।।३२।।

O Arjuna, I am the beginning, the middle

and the end of all creations.

I am the knowledge of Adhyatam

amongst all disciplines of knowledge and

I am the reasoning employed by those who debate.

Chapter 10 Shloka 32

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।।३२।।

The Lord now says:

O Arjuna, I am the beginning, the middle and the end of all creations. I am the knowledge of Adhyatam amongst all disciplines of knowledge and I am the reasoning employed by those who debate.

a) The Lord has said in the 20th shloka of this very chapter, that He is the beginning, the middle and the end of all living beings. Here, He claims to be the beginning, the middle and the end of all that is created. “I am this entire inert and conscious creation. I also constitute this entire Prakriti and I am the source of its origin, its sustenance and its final dissolution.”

b) The Lord says that He is the knowledge of Adhyatam amongst all disciplines of knowledge.

Knowledge of Adhyatam

1. Knowledge of the Atma and the anatma or all that is not the Atma.

2. Discernment between the inert and the conscious.

3. That knowledge which transforms the individual into an Atmavaan.

4. That knowledge which makes the individual divine.

5. That knowledge which establishes the individual in his Self.

6. That knowledge which grants the individual eternal bliss.

Knowing this wisdom, nothing else remains to be known. The Lord says, the king of all wisdom is the knowledge of Adhyatam. “I am that knowledge.”

“I am vaad – the speech employed by those who debate.”

1. Speech is sound.

2. Vaad refers only to that questioning and discussion that is employed to discover the Truth.

3. Vaad is that discussion which is based on the rules of debate.

The Lord says, “I am that vaad.”

अध्याय १०

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।।३२।।

अब भगवान कहने लगे कि :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ,

२. विद्याओं में अध्यात्म विद्या मैं ही हूँ,

३. (और) विवाद करने वालों का वाद मैं ही हूँ।

तत्व विस्तार :

क) भगवान ने इसी अध्याय के बीसवें श्लोक में कहा था कि ‘भूतों का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ’ यहाँ कह रहे हैं कि ‘सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ। सम्पूर्ण जड़, चेतन सृष्टि मैं ही हूँ और सम्पूर्ण प्रकृति की रचना भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण रचना का आदि, स्थिति तथा लय स्थान मैं ही हूँ।’

ख) भगवान कह रहे हैं कि “सम्पूर्ण विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ।”

अध्यात्म विद्या :

1. आत्म अनात्म विवेक है।

2. जड़ चेतन विवेक है।

3. जीव को आत्मवान् बना देती है।

4. जीव को भगवान बना सकती है।

5. जीव को स्वरूप स्थित करवा सकती है।

6. जीव को नित्य आनन्द पूर्ण स्थिति दिला सकती है।

इसे जान कर कुछ भी जानना बाकी नहीं रह जाता। सो भगवान कहते हैं, ‘विद्याओं का राजा, अध्यात्म विद्या मैं ही हूँ।’

ग) “विवाद करने वालों का वाद मैं ही हूँ।”

1. वाद, ध्वनि को कहते हैं।

2. वाद, केवल सत्त्व को जानने के लिए किये जाने वाले विचार विमर्श को कहते हैं।

3. वाद, केवल सत्य को जानने के लिए किये जाने वाले तर्क वितर्क को कहते हैं।

4. वाद, केवल सत्त्व को जानने के लिए किये जाने वाले परिप्रश्न को कहते हैं।

5. वाद, न्याययुक्त वाद विवाद को कहते हैं। भगवान कहते हैं, ‘यह वाद मैं ही हूँ।’

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