Chapter 10 Shloka 28

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि:।।२८।।

Amongst weapons, I am the thunderbolt;

amongst cows I am Kaamdhenu;

I am Kandarpa (Kaamdeva) amongst progenitors;

and I am Vaasuki amongst serpents.

Chapter 10 Shloka 28

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि:।।२८।।

The Lord says:

Amongst weapons, I am the thunderbolt; amongst cows I am Kaamdhenu; I am Kandarpa (Kaamdeva) amongst progenitors; and I am Vaasuki amongst serpents.

A. The Lord says, “I am the thunderbolt amongst all weapons.”

1. The thunderbolt is the weapon of Indra.

2. The thunderbolt causes great destruction and injury.

3. Lightening, too, is synonymous with the thunderbolt.

4. It could be taken to mean here, that the Lord descends upon the tyrannical like a thunderbolt.

5. He is the thunderbolt that annihilates the demons.

6. He is the protective force of the thunderbolt.

B.  The Lord says, “Amongst the cows, I am Kaamdhenu.”

1. Kaamdhenu is the cow of the gods.

2. She fulfils every desire of living beings.

3. She sustains and nourishes the bodies of mortals.

4. She strengthens their minds.

5. She enhances the growth of the intellect.

C. The Lord says that He Himself is the Progenitor Kaamdeva.

1. He is the zenith of marital love.

2. He is the desire of union in married couples.

3. He is their desire for the blossoming of their love in the form of progeny.

D. He is Vaasuki amongst the sarpas or serpents.

1. The king of serpents, Vaasuki, who is adorned with a supreme, divine jewel, is the Lord Himself.

2. Vaasuki, the most venomous of all serpents, is the Lord Himself.

3. The Lord says Vaasuki, the king of serpents, is His own form.

अध्याय १०

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि:।।२८।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. शस्त्रों में वज्र मैं हूँ,

२. गायों में कामधेनु मैं हूँ,

३. और सन्तति उत्पन्न करने वाला कन्दर्प मैं हूँ,

४. सर्पों में मैं वासुकि हूँ।

तत्व विस्तार :

क) भगवान कहते हैं – “शस्त्रों में मैं वज्र हूँ।”

1. वज्र इन्द्र के शस्त्र को कहते हैं।

2. वज्र विनाशकारी, घातक शस्त्र को कहते हैं।

3. वज्र, बिजली को भी कहते हैं।

4. क्यों न कहें कि आततायियों पर वह वज्र बन कर गिरते हैं।

5. असुर जनों के विध्वंसक वज्र भगवान हैं।

6. वज्र रूप संरक्षण करने वाली शक्ति भगवान हैं।

ख) भगवान कहते हैं कि “धेनुओं में मैं कामधेनु हूँ।”

कामधेनु

1. देवताओं की धेनु मानी गई है।

2. जीवों की हर कामना पूरी करने वाली है।

3. जीवों की तनोपुष्टि करती है।

4. जीवों की मनोपुष्टि करती है।

5. जीवों की बुद्धि की वृद्धि करती है।

ग) भगवान कहते हैं कि जीवों को उत्पन्न करने वाला कामदेव भगवान स्वयं हैं।

– दम्पति प्रेम की पराकाष्ठा भगवान स्वयं हैं।

– दम्पति की एकरूपता की चाहुक वृत्ति भगवान स्वयं हैं।

– दम्पति प्रेम, जो प्रेम के जीव रूप फूल खिलाना चाहते हैं, उसकी चाहना वह आप हैं।

घ) सर्पों में वह वासुकि हैं।

– परम दिव्य मणि सम्पन्न सर्पों के राजा ‘वासुकि’ भगवान आप हैं।

– सबसे अधिक भयंकर विष वाला सर्प वह आप हैं।

– सर्पों का राजा वासुकि है, जिसको भगवान अपना ही रूप कह रहे हैं।

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