Chapter 10 Shloka 24

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।

सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर:।।२४।।

And O Arjuna!

Amongst the great priests, I am Brihaspati;

I am Skanda amongst the commanders of armies,

and the ocean amongst the natural reservoirs.

Chapter 10 Shloka 24

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।

सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर:।।२४।।

Speaking of His divine manifestations, the Lord continues:

And O Arjuna! Amongst the great priests, I am Brihaspati; I am Skanda amongst the commanders of armies, and the ocean amongst the natural reservoirs.

The Lord says “I am Brihaspati amongst the priests.”

Little one, a priest is one who:

a) works as another’s representative;

b) looks after the work of others, in their interest;

c) serves another in the other’s absence.

Brihaspati (बृहस्पति)

a) Brihaspati is known to be the possessor of total and complete knowledge.

b) Brihaspati is known as Indra’s priest.

c) Brihaspati is known to have been instrumental in establishing the devtas or deities in the Atma.

d) Brihaspati is also the priest of the devtas or deities.

“I am Skanda amongst the commanders of armies.”

1. Skanda was the commander of the armies of the divine forces – the devtas.

2. He is the protector of those who fight for the Truth.

3. He is known as the god of war.

4. He is the annihilator of demons and their demonic attributes.

5. He is the protector of goodness.

6. He is considered to be extremely proficient in deeds and in diplomacy.

The Lord says, “I am that Skanda!”

Then the Lord says, “Amongst all natural reservoirs, I am the ocean.”

That ocean into which all rivers flow, from which all the clouds absorb water to fill all the reservoirs, that ocean is the Lord Himself.

Arjuna had requested the Lord, “Tell me of Your divine manifestations, meditating on which I can know You.”

In reply it is as if the Lord is saying, “No matter what you meditate on, I am that. Meditate on it, knowing it to be Me.” Remember, the Lord had said earlier that He does not destroy anybody’s faith. Whatever you have faith in, know that to be a divine manifestation or vibhuti of the Lord. It is verily a constituent of the indestructible Atma Self.

अध्याय १०

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।

सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर:।।२४।।

भगवान अपनी विभूतियाँ बताते हुए आगे कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. और हे अर्जुन!

२. पुरेहितों में मैं बृहस्पति हूँ,

३. सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ,

४. (और) सरोवरों में मैं सागर हूँ।

तत्व विस्तार :

भगवान कहते हैं, “पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूँ।”

नन्हीं! पुरोहित वे होते हैं जो,

क) दूसरों के दूत बन कर उनके काम करते हैं।

ख) दूसरों के हित में उनका कार्य भार सम्भालते हैं।

ग) किसी की अनुपस्थिति में उसका काम और सहचारिता करते हैं।

बृहस्पति :

क) बृहस्पति अखण्ड ज्ञान सम्पन्न कहे गये हैं।

ख) बृहस्पति इन्द्र के पुरोहित माने गये हैं।

ग) बृहस्पति देवताओं को आत्म में विलीन कराने वाले माने गये हैं।

घ) बृहस्पति देवताओं के पुरोहित माने जाते हैं।

“सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ।”

स्कन्द :

1. देवताओं के सेनापति कहलाते हैं।

2. सत्य के लिए लड़ने वालों का संरक्षण करते हैं।

3. युद्ध के देवता माने जाते हैं।

4. असुरों के और असुरत्व के विनाशक हैं।

5. साधुता के संरक्षक हैं।

6. महा दक्ष तथा नीति प्रवीण माने जाते हैं।

भगवान कहते हैं, “वह स्कन्द मैं ही हूँ।”

फिर भगवान कहते हैं, “सम्पूर्ण जलाशयों में मैं सागर हूँ।”

अर्थात् जिस सागर में सम्पूर्ण नदियाँ समा जाती हैं और जिस सागर से बादल जल लेकर सम्पूर्ण जलाशयों को भर देते हैं, वह मैं आप हूँ।

अर्जुन ने भगवान से पूछा था कि, “आप अपनी विभूतियाँ बताईये, जिनका चिन्तन करते हुए मैं आपको जान सकूँ।”

यहाँ मानो भगवान कह रहे हों कि ‘तुम जिसका भी ध्यान लगाओ, वह सभी मैं हूँ। तुम जिसका भी चिन्तन करो, वह मुझे ही जानकर चिन्तन करो।’ याद रहे, भगवान ने कहा था कि वह किसी की श्रद्धा भंग नहीं करते। आपको जिसमें भी श्रद्धा हो, उसे ही भगवान की विभूति मान लो, वह अखण्ड आत्म तत्व का ही अंग हैं।

Copyright © 2018, Arpana Trust
Site   designed  , developed   &   maintained   by   www.mindmyweb.com .
image01