Chapter 10 Shlokas 16, 17

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:।

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।१६।।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।१७।।

You alone can describe in full Your divine abilities

whereby You pervade these worlds.

O YogeshwarLord of Yoga! Through what process

of continuous meditation shall I know You?

And Lord! In what particular attitudes

are You to be meditated upon by me?”

Chapter 10 Shlokas 16, 17

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:।

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।१६।।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।१७।।

Arjuna says to the Lord, “You know yourself, therefore,

You alone can describe in full Your divine abilities whereby You pervade these worlds. O Yogeshwar! Lord of Yoga! Through what process of continuous meditation shall I know You? And Lord! In what particular attitudes are You to be meditated upon by me?”

Arjuna prays to the Lord, “You alone know Yourself. Pray reveal to me those divine manifestations in which You inhere.

1. I wish to know Thee.

2. Which attributes of Thine shall I glorify so that I may understand Thee?

3. Which objects shall I perceive as Thy manifest form?

4. In which sense objects is it possible to perceive Thee? I want union with Thee.

5. Through which divine manifestations can I dwell upon Thee constantly?

6. How shall I know Thy Omnipresence?

7. O Lord of Yoga, O Yogeshwar, I desire union only with Thee. Please show me how this can be made possible!

8. In what state of mind shall I meditate upon Thee so that I can attain Thee?

I know that what You have said is the Truth. You are the Supreme Goal. However, it is only You who can show me Your way; only You can guide me as to which form I should seek You in and with what attitude I should meditate upon You. O Compassionate One, show me the way – only then can I reach You!”

Little one, Arjuna has realised that in order to know the Lord and to unite with Him,

a) continuous meditation is imperative;

b) it is essential to practice His attributes in life;

c) it is important to adopt a viewpoint similar to His;

d) it is important to have Him as one’s constant witness in every aspect of life;

e) detachment with the body is essential;

f) it is important to live life with a selfless attitude.

However, Arjuna seeks to clarify the ingredients required to meditate exclusively upon the Lord; the attitude with which that meditation should be conducted and the divine manifestations upon which one should meditate. So Arjuna is questioning the Lord Himself.

अध्याय १०

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:।

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।१६।।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।१७।।

अर्जुन कहने लगे भगवान को, आप अपने आपको स्वयं जानते हो, इसलिये :

शब्दार्थ :

१. जिन जिन विभूतियों से इन लोगों को व्याप्त करके आप स्थित हो,

२. उन अपनी दिव्य विभूतियों को,

३. पूर्णता से आप ही कहने योग्य हो।

४. हे योगेश्वर! सदा चिन्तन करता हुआ,

५. मैं आपको कैसे जानूँ?

६. और हे भगवन्! किन किन भावों से

७. आप मुझसे चिन्तन किये जाने योग्य हैं?

तत्व विस्तार :

अर्जुन भगवान से प्रार्थना करते हैं कि, ‘आप ही अपने आपको जानते हो, आप ही स्वयं मुझे बताएँ कि आप इस संसार में किन किन विभूतियों में विराजमान हैं?”

1. मैं आपको जानना चाहता हूँ, कैसे जानूँ?

2. मैं आपके कौन से गुण गाऊँ जिनकी राह से आपको समझ सकूँ?

3. किस किस विषय को आपकी विभूति रूप देखूँ?

4. किस किस विषय में मुझे आपका दीदार हो सकता है?

5. मैं आपका निरन्तर चिन्तन किन विभूतियों के राही करूँ?

6. मैं आपकी सर्वव्यापकता को कैसे समझूँ?

7. हे योग के पति, हे योगेश्वर! मैं आप ही से योग चाहता हूँ। आप ही कहें यह योग कैसे सफल हो?

8. मैं किन किन भावों में आपका चिन्तन करूँ कि अब आपसे मिलन हो जाये?

मैंने जान लिया जो आपने कहा वह सत्य है और आप ही परम लक्ष्य हो, किन्तु आप ही मुझे अपनी राह बता सकते हो और आप ही मुझे यह भी बता सकते हो कि किन किन विभूतियों में आपको ढूँढूँ और किन भावों में आपका चिन्तन करूँ।

सो हे करुणा पूर्ण! आप ही अब राह दिखाओ, तब ही तो आप तक आ सकूँगा।’

नन्हीं! अर्जुन ने यह जान लिया कि भगवान को जानने और उनसे योग के लिए

क) निरन्तर चिन्तन अनिवार्य है।

ख) उनके गुणों का जीवन में अभ्यास अनिवार्य है।

ग) उनके जैसा दृष्टिकोण होना अनिवार्य है।

घ) जीवन के हर पहलू में उनका साक्षित्व अनिवार्य है।

ङ) तन से निरासक्त होना अनिवार्य है।

च) जीवन में निष्काम भाव से रहना अनिवार्य है।

किन्तु परम का अखण्ड चिन्तन करने के लिये किस भाव में रहा जाए और किस किस विभूति में भगवान को देखा जाए, यह जानने के लिए अर्जुन भगवान से ही पूछ रहे हैं।

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