Chapter 10 Shloka 10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०।।

To those ever absorbed thus in My Name,

who lovingly worship Me, I endow

that buddhi yoga – the divine understanding

by which they can reach Me.

Chapter 10 Shloka 10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०।।

The Lord says:

To those ever absorbed thus in My Name, who lovingly worship Me, I endow that buddhi yoga – the divine understanding by which they can reach Me.

The Lord speaks of ‘Those who remain ever absorbed in My Name’ – that is, those who transact their ‘business of life’ in the constant presence of the Lord; those imbued with love and faith, who disseminate the Lord’s divine qualities from their very being. To such devotees the Lord proclaims, “I grant them buddhi yoga.”

Buddhi Yoga (बुद्धि योग)

An intellect that:

a) can ensure union with the Supreme;

b) can impart experience of the Supreme Essence;

c) can endow an understanding of the subtlest mysteries of that Supreme Essence;

d) can remove the veil that cloaks the face of that Supreme Essence;

e) can pierce the curtain of one’s own ignorance;

f) can discern between Truth and untruth;

g) can understand the cause of mortal existence;

h) can uncover the truth about the conscious and the inert;

i)  can understand the divine energy of the Supreme;

j)  can comprehend the route to immortality.

The Lord says, “I impart such an intellect, which ensues the individual’s union or yoga with Me.”

What is buddhi yoga when perceived in regard to the Supreme? What is that yoga of the Intellect that is endowed by the Lord Himself?

One must remember that this is a gift given by the Lord Himself. He will inevitably give what is a part of Himself! We can attain the material – what He offers is that which transcends the material world. He offers this gift to His beloved devotee; in fact this gift is a gift to Himself! He can only bestow a divine gift! What else can one receive from the Lord’s own abode? What gift will the Lord give if not His divine qualities? He proclaims, “I impart the yoga of the intellect.”

1. That intellect which can be absorbed in the Lord’s intellect.

2. The view point of the Supreme.

3. A perception of the world akin to the Lord’s own.

4. An outlook upon life which resembles that of the Supreme.

5. A perception of human interaction which resembles that of the Supreme.

6. A perception of the interplay of qualities which is akin to that of the Supreme.

7. A perception of life’s quintessence akin to that of the Supreme.

8. A perception of Truth and untruth as perceived by the Lord Himself.

When the Lord’s point of view becomes predominant in life, such an intellect can be said to be the intellect of one established in yoga.

The Lord gifts such a ‘buddhi yoga’ as prasaad to the one who remains ever absorbed in His Name. The moment of union is imminent. The Lord says, “Such a one will now attain Me.” In fact such a one is now at no distance at all from the Supreme. He is already immersed in the Lord. His body belongs to the Lord.

अध्याय १०

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. उन, निरन्तर मेरे नाम में निमग्न,

२. और प्रेमपूर्वक मेरा *भजन करने वालों को,

३. मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वह मुझ तक पहुँच जाते हैं।

(*श्लोक ४/११ देखें)

तत्व विस्तार :

भगवान कहते हैं, “उन निरन्तर मेरे नाम में निमग्न रहने वालों को”, यानि, जो निरन्तर भगवान के साक्षित्व में रह कर व्यवहार करते हैं, जो प्रेम और श्रद्धा से युक्त हुए भगवान के गुणों को अपने तन राही प्रवाहित करते हैं, भगवान कहते हैं, “उनको मैं बुद्धियोग देता हूँ।”

बुद्धियोग :

ऐसी बुद्धि, जो :

1. परम से योग करवा सके,

2. परम तत्व का अनुभव करा सके,

3. परम तत्व का सूक्ष्म अति सूक्ष्म राज़ समझा सके,

4. परम तत्व के चेहरे से घूँघट उठा सके,

5. अपने ही अज्ञान का पर्दा विदीर्ण कर सके,

6. सत् असत् विवेकी हो,

7. जीवत्व भाव का कारण समझ सके,

8. जड़ चेतन का राज़ खोल पाए,

9. परम विभूति समझ सके,

10. अमरत्व विधि जो समझ पाए।

भगवान कहते हैं, ‘मैं ऐसी बुद्धि देता हूँ, ऐसा बुद्धि योग देता हूँ।’

परम से बुद्धि योग क्या होगा? जो परम ने दिया, वह बुद्धि योग क्या होगा?

याद रहे, यह परम उपहार भगवान दे रहे हैं, वह अपना ही कुछ देंगे। लौकिक तो हम पा लेंगे, वह तो कुछ अलौकिक ही देंगे। फिर वह यह उपहार अपने भक्त को अपने प्रिय को देंगे। उन्होंने अपने आपको ही दिया है। वह कोई दिव्यता ही तो देंगे।

भगवान के घर से और क्या पाएगा कोई? भगवान अपने गुण ही तो देंगे! वह कहते हैं, “मैं बुद्धियोग देता हूँ” यानि,

क) वह बुद्धि, जो परम की बुद्धि में समाहित हो जाती है।

ख) भगवान उसको परम का दृष्टिकोण देते हैं।

ग) उसकी सृष्टि पर दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

घ) उसकी जीवन पर दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

ङ) जीव व्यवहार पर उसकी दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

च) गुण राज़ पर उस की दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

छ) जीवन सारांश पर उसकी दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

ज) सत् असत् पर उसकी दृष्टि परम के समान ही हो जाती है।

झ) परम का दृष्टिकोण जीवन में प्रधान हो, तब ही तो ऐसे ‘बुद्धि योग स्थित’ की बुद्धि माने।

नाम के प्रसाद में भगवान ने बुद्धि योग दिया। मिलन बेला तो आ ही पहुँची। भगवान कहते हैं, ‘अब वह मुझे पा लेगा।’ अजी पाना भी क्या, अब तो वह परम से दूर है ही नहीं, वह तो भगवान में खो चुका है। उसका तन तो भगवान का ही हो चुका है।

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