Chapter 10 Shloka 9

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।९।।

With their mind fixed on Me resolutely,

those who offer their lives unto Me and constantly

engage in discussion with each other about Me;

knowing Me and speaking of Me thus

they remain content and ever absorbed in Me.

Chapter 10 Shloka 9

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।९।।

With their mind fixed on Me resolutely, those who offer their lives unto Me and constantly engage in discussion with each other about Me; knowing Me and speaking of Me thus they remain content and ever absorbed in Me.

Kamla my dearest, listen carefully: the Lord says, “They who thus concentrate on Me, offer Me their life. No longer are they afraid of death – nor do they aspire for life. Having given Me their very being, their body becomes Mine. I begin to live in them. When they speak amongst each other, they discuss Me alone and thus grow to know Me better. Thus their knowledge grows and the more they know Me, the happier they become. Such devotees dwell in Me alone, because it is the mind that wanders, and their mind is fixed only in Me.”

The state of the individual after establishment in the Supreme

The mind of such a one merges with the intellect and the intellect with the Supreme One. Attachment with the body is annihilated. The body is ever engaged in fulfilling its duties in the world. The mind that had first given the body complete precedence, now considers that body to be a dwelling place of the Supreme. The body interacts in the world, but without any compulsion of the mind. Through the body, the mind habitually partook of the world and its sense objects; it had much to achieve through the body. Now the mind, immersed in the Lord, has offered the body along with its very life breath to the Lord. It could be said that the Lord Himself has been reincarnated in that body.

The incarnation of the Lord’s spirit

Little one, those who take the Lord’s Name with a pure heart, perform all actions in the presence of their divine Beloved. They do nothing which the Lord Himself would not have done had He been in the same situation. Gradually, they begin to forget themselves and it seems as though that Supreme One Himself dwells within them.

Little one, they who offer their very life-breath to the Lord, abide henceforth in the aura of His divine attributes. It matters not to them whether they live or die. They worship the Lord, they speak of the Lord and knowing Him thus, they speak as the Lord Himself would have spoken. They speak only of the Lord, the Atma. They discuss the inner essence of the Atmavaan and his manifest attributes. Their every word is replete with knowledge. They identify with the particular attributes of whosoever comes before them and speak to him as such. They dwell only in the Atma and thus remain ever satiated and joyful.

Now understand the essence of such abidance in the Atma. All the manifest forms of the world are for them constituents of that Atma. They know all to be the Atma in Essence as indeed they themselves are; they pay no heed to differentiating attributes. United with the Atma, they become one with all. They also understand that the attributes veil the Atma, hence they do not find it difficult to identify with the attributes and traits of others. That which is undifferentiated from the point of view of the Atma, appears differentiated when seen from the angle of the varied attributes. Attributes and qualities are nothing but a game – mere veils created by destiny.

Abha, if you too become detached like a lotus remains ever unaffected by the muddy water in which it exists, you will verily become what your name signifies; ‘Abha’ – the luminous one who abides in the Supreme Atma.

अध्याय १०

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।९।।

ध्यान से सुन भगवान क्या कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. मुझमें निरन्तर ध्यान लगाने वाले,

२. मेरे को ही प्राण अर्पण करने वाले,

३. नित्य आपस में मेरी चर्चा करने वाले,

४. मुझे ही जानते हुए और मेरा ही कथन करते हुए तुष्ट रहते हैं

५. और निरन्तर मुझ में ही रमण करते हैं।

तत्व विस्तार :

कमला मेरी जान्! ध्यान से सुन! भगवान कहते हैं कि,

‘मुझ में निरन्तर ध्यान लगाने वाले मुझे अपने प्राण दे देते हैं। उन्हें जीने या मरने की क्या परवाह होती है? जब प्राण ही दे दिये, तो उनका तन मेरा ही हो जाता है। यानि, उनमें मैं मूर्तिमान होने लगता हूँ। परस्पर बात करते हैं तो मेरी ही बात करते हैं। परस्पर बात करते हुए भी मेरे को और अधिक जान लेते हैं। यानि, उनके ज्ञान का वर्धन होता जाता है और वे जितना जितना अधिक जानते हैं, उतने ही मुदित मनी होते जाते हैं।

ये लोग निरन्तर मुझी में रमण करते हैं; क्योंकि रमण मन करता है और उनके मन में मैं ही हूँ।’

परम मिलन के पश्चात् स्थिति :

उनका मनो संयोग बुद्धि से हुआ, तथा बुद्धि योग परम से हुआ। उनका तन से वियोग हो गया तथा तन केवल जग धर्म ही करता रहा। मन, जिसने पहले तन को प्रधानता दी थी, अब परम धाम वह हो गया। अब तन जग में तो विचरता है पर मन का प्रयोजन नहीं रहा। तन राही मन जग का और विषयों का उपभोग करता था, तन राही इस मन को बहुत कुछ पाना था, अब मन भगवान में जा टिका और उसने जीते जी प्राण सहित यह तन भगवान को दे दिया। मानो उस तन में साक्षात् भगवान सप्राण हो गये।

भगवान का सप्राण होना :

नन्हीं! जो सच्चे हृदय से भगवान का नाम लेते हैं, वे जीवन में निरन्तर अपने प्रेमास्पद के साक्षित्व में ही काज कर्म करते हैं। वे ऐसी कोई बात नहीं करते जो भगवान स्वयं न करते। शनै: शनै: वे अपने आपको भूलने लगते हैं और ऐसे लगता है कि उनमें नामी बसने लगता है।

नन्हीं! जो अपने प्राण ही अर्पण कर देते हैं, वे परम गुण में ही जीते हैं। उन्हें मरने या जीने की परवाह नहीं होती। वे भगवान का भजन करते हैं, वे भगवान का कथन करते हैं, वे भगवान को जानते हुए जब बात करते हैं, तो वही कहते हैं जो भगवान कहते हैं। वे भगवान, यानि आत्मा की ही बात करते हैं, फिर आत्मवान् के रूप और स्वरूप की चर्चा करते रहते हैं। उनकी हर बात ज्ञान की होती है। जैसा उनके सामने आये, वे उसे उसके गुण के अनुसार समझाते हैं। वे निरन्तर आत्मा में ही रमण करते हुए नित्य संतुष्ट तथा आनन्द में रहते हैं।

आत्म रमण का राज़ पुन: समझ ले! उनके लिए अखिल रूप आत्मा ही है। वे गुणों पर ध्यान न देते हुए, सबको अपने समान आत्मस्वरूप ही जानते हैं। वे आत्मा के नाते सब से एक रूप होते हैं। वे आत्मा पर गुण आवरण भी समझते हैं, इस कारण उन्हें दूसरों के गुणों से तद्‍रूप होना कठिन नहीं लगता। आत्मा के नाते जो अभेद है, गुणों के नाते वहाँ भेद है। गुण केवल खिलवाड़ है, गुण केवल रेखा रचित आवरण है।

सत्यप्रिय आभा! यदि तू भी कमल की भान्ति बने, तो सच ही आत्म रमणी, परमात्म आभा बन जाए।

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