Chapter 6 Shloka 7

जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:।।७।।

The Supreme Lord Himself abides

in that emancipated one,

who remains steady and unperturbed

even whilst dwelling in heat and cold,

pleasure and pain, honour and dishonour.

Chapter 6 Shloka 7

जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:।।७।।

The Lord now says:

The Supreme Lord Himself abides in that emancipated one, who remains steady and unperturbed even whilst dwelling in heat and cold, pleasure and pain, honour and dishonour.

The Atmavaan’s life – established in equanimity

Little one, now the Lord describes the Atmavaan:

a) Such a one maintains the same attitude in heat and cold, joy and sorrow, honour and dishonour.

b) He dwells in an attitude of equanimity amidst duality.

c) He is untouched by raag and dvesh.

d) He is neither involved in the pursuit of any specific action, nor does he seek to escape from it.

e) He does not seek recognition, nor does he crave freedom from censure.

f) He does not seek happiness, nor escape from sorrow.

g) He seeks not the fulfilment of any desire nor does he renounce what is not likeable.

h) Ever impartial, such a one is detached from himself. No attachments cling to him and he is devoid of any aberrations.

i)  He has identified himself with the Atma and renounced the body idea.

j)  Such a one merges in the Atma, transcending the anatma – the body and sense objects. He is absorbed in the Supreme Atma.

Visibly the body exists, but the ‘I’ inherent in the body idea no longer exists. He is manifest, yet he transcends both name and form. His body acts but he is a non-doer, since he no longer identifies with the body. His body partakes of sense objects, but such an Atmavaan is no longer an ‘enjoyer’.

All that remains then is the uninfluenceable witness. It is said that the Lord Himself abides in every sphere of such a one’s life. He is never distanced from his Supreme Atma Self – his intrinsic essence. Ever abiding in equanimity, he is the living proof of eternal bliss. He is the eternal, luminous radiance of Adhyatam – the life divine. One could say that such a one has attained Supreme Divinity.

अध्याय ६

जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।

शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:।।७।।

अब भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. शीत, ऊष्ण, सुख, दु:ख तथा मान और अपमान में जो प्रशान्त रहता है,

२. उस, अपने आपको जीते हुए आत्मा में परमात्मा समाहित है।

तत्व विस्तार :

आत्मवान् का जीवन समभाव में स्थित है:

नन्हीं! अब भगवान आत्मवान् के विषय में कहते हैं कि वह :

क) सर्दी गर्मी में सम भाव से रहता है।

ख) सुख दु:ख में सम भाव से रहता है।

ग) मान और अपमान में भी सम भाव से रहता है।

घ) वह जीवन में द्वन्द्वों से सदा अप्रभावित रहता है।

ङ) वह जीवन में राग द्वेष युक्त नहीं होता।

च) वह जीवन में न निवृत्ति चाहता है न प्रवृत्ति ही चाहता है।

छ) वह जीवन में न मान चाहता है और न अपमान से निवृत्ति चाहता है।

ज) वह जीवन में न सुख ही चाहता है और न दु:ख से नजात पाना चाहता है।

झ) वह जीवन में न अपनी रुचि पूर्ति ही चाहता है और न अरुचिकर का त्याग करना चाहता है।

ञ) वह नित्य निरपेक्ष तथा अपने प्रति नित्य उदासीन होता है। वह तो नित्य निर्लिप्त और निर्विकार ही होता है।

ट) वह आत्मा के तद्‍रूप होकर तनत्व भाव को छोड़ चुका होता है।

ठ) वह आत्मा में विलीन हो जाता है और अनात्मा, तन तथा विषयों से उठ जाता है। वह तो परम आत्मा में समाहित होता है।

वहाँ पर देखने में तो तन होता है, किन्तु तनत्व भाव पूर्ण ‘मैं’ नहीं होती। वह रूपवान् होते हुए भी नाम और रूप से रहित होता है। उसका तन तो नित्य क्रियाशील रहता है, किन्तु क्योंकि वह तन ही नहीं, इस कारण वह नित्य अकर्ता ही होता है। उसका तन तो भोग करता है, किन्तु वह आत्मवान् अपने को जब तन ही नहीं मानता तो वह भोक्ता भी नहीं रहता।

तब केवल द्रष्टा मात्र रह जाता है। वह तो स्वयं केवल साक्षी रूप रह जाता है और वह नित्य निर्लिप्त हो जाता है। कहते हैं ऐसे जीवात्मा के जीवन के हर पहलू में परमात्मा समाहित रहता है। यानि, वह अपने परम आत्म स्वरूप से कभी विचलित नहीं होता। वह तो हर परिस्थिति में निर्विकार तथा समभाव में स्थित रहता है और नित्य आनन्द स्वरूप का प्रमाण रूप हो जाता है। वह तो स्वयं नित्य अध्यात्म प्रकाश स्वरूप हो जाता है और आत्मवान् का जीवन रूप प्रमाण बन जाता है। वह तो स्वयं आत्मवान् स्वरूप, भगवान रूप बन जाता है।

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