Chapter 5 Shloka 5

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।

The state that one attains through Saankhya

is also achieved through Yoga.

He who sees Saankhya and Yoga as one,

sees correctly.

Chapter 5 Shloka 5

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।

Stressing on the identity of Saankhya and Yoga, the Lord says:

The state that one attains through Saankhya is also achieved through Yoga. He who sees Saankhya and Yoga as one, sees correctly.

Little one! Bhagwan once again repeats that Saankhya and Yoga are one: “He who knows of this identity, he knows the truth.”

Saankhya

Yoga

1. Knowledge of the Supreme Essence. 1. Union with the Supreme Spirit of the Lord.
2. Description of the unity between the individual Atma and the Supreme Paramatma. 2. Mergence of the Atma in Paramatma.
3. Knowledge of the Atma as the Eternal Witness. 3. Realisation of this Truth of Saankhya is Yoga.
4. Knowledge of the non-doership of the Atma. 4. Relinquishing the belief of doership is Yoga.
5. Knowledge of the Atma being a non-participating witness is Saankhya. 5. To believe that one is not a participator is Yoga.
6. Saankhya states that the Universe is created through the interplay and union of gunas. 6. Belief in this Truth is Yoga.
7. Saankhya is knowledge of the Atma. 7. Yoga leads to attainment of the state of an Atmavaan.
8. Saankhya explains the distinction between the inert and the Atma. 8. Yoga separates the jivatma from the inert and unites him with the Atma.
9. Saankhya is arid knowledge. 9. Yoga is a warm union of that knowledge with life.
10. Saankhya breaks the age old affinity of the inert with the live. 10. Yoga takes the broken relationship of the jivatma and reinstates it in the Supreme; it brings about the convergence of the Atma and the jivatma.
11. Saankhya  explains the basic sameness of all things. 11. Yoga unites  those which are alike.
12. Saankhya describes the Essential Essence or Swaroop. 12. Yoga merges the jiva into his essential Essence.
13. Saankhya explains the oneness of Atma and Paramatma, and the inert nature of Creation. 13. The one established in Yoga abides in the Atma, the Self, and is ever unaffected by the inert nature of Creation.

Little one!

a) Establishment in Saankhya is Yoga.

b) One established in Saankhya knows that one must have a non-differentiating attitude towards all; the Yogi is the embodiment of that attitude.

c) Yoga or union in Saankhya will necessarily render proof of the life of an Atmavaan.

d) If Saankhya is the knowledge of Brahm, then Yoga is His Nature and Prakriti His life.

e) If Saankhya explains the Essence of the Supreme, then Yoga is silence and Prakriti is the manifest form, and the life of one who is established thus in silence will be Yagya.

f) One can say that the Atma is the silent essence of Yagya. Knowledge revealed through Saankhya exhorts the aspirant to abide in that Atma and give proof of being an Atmavaan in practical life. Then his life will overflow with the qualities that characterise the Atmavaan. Then one will truly be the Eternal Enlightened Essence of Adhyatam.

अध्याय ५

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।

भगवान फिर से सांख्य और योग की एकरूपता का निरूपण करते हुए कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. सांख्य द्वारा जो स्थान प्राप्त होता है;

२. योग भी वही प्राप्त करता है;

३. जो पुरुष सांख्य और योग को एक देखता है, वही (यथार्थ) देखता है।

तत्व विस्तार :

नन्हीं आत्मा! भगवान फिर से सांख्य और योग का एकत्व सुझा रहे हैं। इस एकत्व को जो जीव जानता है, वह ही यथार्थ सत्य समझता है।

सांख्य और योग को पुन: समझ ले :

सांख्य

योग

1. परम तत्व विवेक है। 1. परम तत्व में एक रूप होना है।
2. आत्मा और परमात्मा में एकत्व का निरूपण है। 2. आत्मा और परमात्मा का एक रूप हो जाना है।
3. आत्मा के नित्य साक्षी होने का ज्ञान है। 3. उस सांख्य कथित तत्व को मान लेना योग है।
4. आत्मा के अकर्ता भाव का विवेक सांख्य है। 4. अपने आपको अकर्ता मान लेना और कर्तृत्व भाव को छोड़ देना योग है।
5. आत्मा के अभोक्ता भाव का विवेक सांख्य है। 5. अपने आपको अभोक्ता मान लेना योग है।
6. पूर्ण सृष्टि गुणों के सहयोग और मिलन से उत्पन्न होती है, यह सांख्य कहता है। 6. इस तत्व को मान लेने का नाम योग है।
7. सांख्य आत्म ज्ञान है। 7. योग आत्मवान् बनाता है।
8. सांख्य आत्म ज्ञान विवेक है। 8. योग आत्मवान् का प्रमाण है।
9. सांख्य जड़ व आत्मा को पृथक् कर देता है। 9. योग जीवात्मा का जड़ से वियोग करवा कर आत्मा से मिलन करवाता है।
10. सांख्य शुष्क ज्ञान है। 10. सांख्य प्रतिपादित ज्ञान से प्रेम रूपा मिलन ही योग है।
11. सांख्य जड़ और चेतन के इतने पुराने संयोग को तोड़ देता है। 11. योग उस टूटे हुए सम्बन्ध से उठाकर जीवात्मा को परम में ठौर देता है और आत्मा तथा जीवात्मा का संगम करवा देता है।
12. सांख्य अभिन्नता स्पष्ट करता है। 12. योग अभिन्न का पुनर्मिलन करता है।
13. सांख्य स्वरूप की कहता है। 13. योग परम स्वरूप बना देता है।
14. सांख्य आत्मा तथा परमात्मा के एक होने का और सृष्टि के जड़ होने का ज्ञान है। 14. योग स्थित आत्मा में स्थित होता है और सृष्टि की जड़ता से नित्य अप्रभावित रहने का प्रमाण है।

नन्हीं!

क) सांख्य में स्थिति का नाम ही योग है।

ख) सांख्य स्थित जानते हैं कि प्रकृति के प्रति समभाव, समदृष्टि ही होनी चाहिये; और योगी समभाव, समदृष्टि ही हैं।

ग) सांख्य में योग हो जाये, तो आत्मवान् का प्रमाण मिलता है।

घ) सांख्य को यदि ब्रह्म का ज्ञान कहें तो योग उसका स्वभाव है और प्रकृति उसका जीवन है।

ङ) सांख्य स्वरूप है, योग मौन है, प्रकृति रूप है और यज्ञ स्वरूप है।

च) कहना है तो यूँ कह लो, आत्मा मौन यज्ञ स्वरूप है। सांख्य राही जो ज्ञान पाया वह आपको आत्मा में स्थित होने को कहता है। आत्मा में स्थित होकर जीवन आत्मवान् के समान होना चाहिये। आत्मा से योग हो जायेगा, तब आपका जीवन आत्मवान् के चिन्हों से भरपूर होगा। तब आप शाश्वत अध्यात्म प्रकाश स्वरूप के स्वयं रूप होंगे।

 

Chapter 5 Shloka 5

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।

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