Chapter 1 Shloka 13

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।

After Bhishma Pitamah blew his conch:

Simultaneously several conches, kettle drums,

trumpets, drums and horns blared out

– causing a terrible sound.

Chapter 1 Shloka 13

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।

After Bhishma Pitamah blew his conch:

Simultaneously several conches, kettle drums, trumpets, drums and horns blared out – causing a terrible sound.

Look little one! When one’s justifications gain strength, the mind creates a similar din. Bhishma Pitamah supported Duryodhana and proclaimed war.

Through this proclamation:

1. Bhishma Pitamah declared to the world that he had decided to follow his wrong principles and tread the path of delusion.

2. Though he knew that Duryodhana was evil, he proclaimed that he was fighting for Duryodhana.

3. Thus he announced his final decision – to side with injustice and with one who represented deceit and sin.

Little one, first the blind intellect aids the unmanageable mind. Then strong justifications rise in support of that mind. The mind thus begins to believe in its own righteousness.

When there is a subsequent uproar in the mind:

1. Countless opposing and hitherto concealed latencies arise, clashing as deafeningly as many drums beating together.

2. When these hidden tendencies flare up with fury, the mind’s devices begin to increase.

3. Each negative trait sheds its inhibitions and gains great impetus.

4. Attachment to falsehood creates a terrible flare up and the evil tendencies attain frightening dimensions. The ego’s intensity resounds deafeningly.

5. Temper gets an opportunity to prove itself faultless.

6. Hatred stands alert, waiting to strike in revenge.

7. Pride and arrogance roar thunderously.

8. Greed gets an opportunity to quench its thirst and clamours for fulfilment.

Thus the latent tendencies of the mind loudly play their trumpets and beat their drums, creating a terrible din!

This is what happened when Bhishma Pitamah blew his conch. The evil forces were alerted and all Duryodhana’s supporters blew upon their respective conches and trumpets.

Bhavana

Little one! This is how we deceive ourselves through justification. Bhavana basically deceives itself.

1. The mind and its likes predominate in bhavana;

2. All its arguments are in its own favour and based on illusory premises;

3. Its primary objective is to absolve itself of all duties;

4. Its only task is to prove itself right, great and just; it veils its own reality even from itself and chooses to remain a stranger to its own self;

5. It attempts to hide its sins from its own knowledge: to do this, it even takes cover under the Lord’s name or under a false sense of duty! Even worship at such a level is farcical and illusory because it is not based on facts and is an escape from reality.

Little one, knowledge always reveals our inadequacies to us. If we consider that we measure up to the knowledge we have acquired, that knowledge becomes meaningless. If after reading the Gita we do not live by its tenets, and yet want to be known as devotees of Lord Krishna, we are hypocrites. The intellect can never consider itself to be a true devotee – it is only the deceptive mind and its supporting bhavana which makes judgements. If we begin to feel that we are right or on the path of Truth without measuring upto the knowledge of the Scriptures, this is the work of bhavana. It is this very bhavana which sustains and nourishes our misconceptions.

 

अध्याय १

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।

आभा, नन्हीं!

शब्दार्थ :

१.  भीष्म पितामह के शंख बजाने के बाद,

२.  शंख नगारे और ढोल, मृदंग, नृसिंह आदि बाजे,

३.  एक साथ ही बजे

४.  और वह शब्द महा भयंकर हो गया।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं जान्! जब भावना प्रधान होती है, तब मन इसी तरह शोरोगुल करता है। भीष्म पितामह ने दुर्योधन का साथ देते हुए युद्ध की घोषणा कर दी। यानि :

1.  अपने मिथ्या सिद्धान्तों पर चलने की घोषणा कर दी।

2.  अपने मिथ्या पथ के अनुसरण की घोषणा कर दी।

3.  मानो दुनिया को बता दिया कि हम इस पथ पर जायेंगे।

4.  दुर्योधन को पाप पूर्ण जानते हुए भी उसके पक्ष के समर्थन की घोषणा कर दी।

5.  अन्यायी का समर्थन करने की घोषणा कर दी।

6.  छल कपट का वर्धन करने वाले का साथ देने की घोषणा कर दी।

देख नन्हीं! पहले तो अन्धी बुद्धि ने और फिर भावना ने भी उद्दण्डी मन का साथ दिया।

तब मानो मन अपने आपको और भी ठीक मानने लगा। मन में जब हाहाकार होता है तब :

1.  अनेकों विपरीत वृत्तियाँ घुमड़ पड़ती हैं और शोर रूपा ढोल बजने लगते हैं।

2.  मनोवृत्तियाँ क्रोध से भड़क जाती हैं।

3.  मनो आवेग आगे बढ़ने लगता है।

4.  हर दुर्वृत्ति का संकोच रूपा आवरण उतर जाता है।

5.  हर दुर्वृत्ति को उत्साह मिल जाता है।

6.  असत् से संग हो जाये तो भड़कन भी भयानक होती है।

7.  असाधु वृत्तियाँ तथा आसुरी वृत्तियाँ भयानक रूप धारण कर लेती हैं।

8.  अहंकार भी भड़क भड़क कर गूँज उठता है।

9.  क्रोध को भी अपने को दोष विमुक्त करने का मौका मिल जाता है।

10. द्वेष भी बदला लेने के लिये उठ खड़ा होता है।

11. दम्भ दर्प भी गर्जने लगते हैं।

12. लोभ को भी अपनी क्षुधा शांत करने की गुंजार का मौका मिल जाता है तब यह सब वृत्तियाँ अपनी अपनी बीन तथा नगाड़े बजाती हैं।

यहाँ भी यही हुआ। जब भीष्म पितामह ने अपना शंख बजाया तब अन्यों की भी हिम्मत बढ़ी और दुर्योधन के अनेक सहायकों ने भी अपने शंख नगारे बजाये।

भावना :

नन्हीं बिटिया! भावना अधिकांश अपने को ही धोखे में रखती है।

1.  इसमें मन और मनोरुचि प्रधान होती है।

2.  इसके सम्पूर्ण तर्क वितर्क अपने ही पक्ष में होते हैं।

3.  यह केवल अपने आपको ही हर कर्तव्य से मुक्त करवाती रहती है।

4.  इसके सम्पूर्ण तर्क मानो कल्पना पर आधारित होते हैं।

5.  अपने आपको उचित, न्याय पूर्ण, श्रेष्ठ सिद्ध करना इसका सबसे बड़ा काम है।

6.  अपनी वास्तविकता को यह अपने आप से भी छुपा लेती है।

7.  अपनी वास्तविकता से यह अपने आपको भी बेगाना बनाये रखती है।

8.  अपने आप को भी यह अपने आप से छिपा लेती है।

9.  कभी भगवान का नाम लेकर और कभी मिथ्या कर्तव्य का नाम लेकर यह अपने आपको छिपाती है। पूजा, जो भावना के स्तर पर की जाये वह केवल मनोखिलवाड़ है, मनोविनोद है, भ्रमात्मक है, क्योंकि वह वास्तविकता को भूलकर करी जाती है और वास्तविकता से विमुख होने के लिये की जाती है।

नन्हीं! ज्ञान हमें हमेशा वह बतलाता है जो हम नहीं हैं। जब हम अपने को ज्ञान के समतुल्य तथा सादृश्य मानने लगते हैं तो ज्ञान निष्प्रयोजन हो जाता है। गीता पढ़ते हुए यदि हम गीता की कथनी को जीवन में न मानें और फिर भी अपने आपको उचित या कृष्ण भक्त मानते हैं तो हम झूठ बोलते हैं और मिथ्याचारी हैं। बुद्धि अपने आपको भक्त नहीं मान सकती। केवल झूठे मन की भावना ही अपने आप को ठीक या ग़लत मानने लगती है। यदि ज्ञान या भगवान की कथनी रूपा गीता में बिना तुले हम अपने आपको उचित या सत् पथिक मानते हैं, तो यह भ्रम हमारी भावना ने उत्पन्न किया है और हमारी भावना ही उस भ्रम का पालन पोषण और समर्थन करती है।

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