आत्म-समर्पण

सी. एल. आनन्द

 

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माँ के जीवन का एक स्वरूप अथर्ववेद काण्ड ४, सूक्त १४ में, भगवान् ने आत्म-समर्पण महायज्ञ का स्वरूप बताया है। आजकल यही यज्ञ हमारी आँखों के सामने मधुबन में ‘माँ’ के जीवन में हो रहा है। जो लोग इस वैदिक यज्ञ के स्वरूप को नहीं जानते उनके लिये ‘माँ’ के जीवन के इस गूढ़ पहलू को समझना एक कठिन बात है।

यज्ञ का वेद में अर्थ है- ‘त्याग’, अर्थात् विश्व की भलाई के लिये अपने धन, द्रव्य, ज्ञान और शक्ति आदि का दान करना। गीता में भगवान् ने यज्ञ के भाव को सृष्टि का आधार बताया है, जो प्रजापति ने सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही मनुष्यों के हृदय में उनके कल्याण के लिये उत्पन्न किया। विश्व की भलाई के लिये मनुष्य जितने कर्म करता है, वह सब यज्ञ कहलाते हैं। इस प्रकार का यज्ञ वेदानुसार मनुष्य के जीवन में वायु और जल की शुद्धि के लिये और निरोग्यता के लिये स्थूल अग्नियों की आहुतियों से आरम्भ होता है। यह आत्म-समर्पण के मार्ग पर स्वार्थ के त्याग की पहली पौड़ी है।

वेद के मन्त्रों में जो ‘स्वाहा’ का शब्द आता है उसका अर्थ यह है कि मैं अपने स्वार्थ को त्यागता हूँ। यह यज्ञ में दी हुई आहुति मैं दूसरों की भलाई के लिये देता हूँ, अपने भोग बढ़ाने के लिये नहीं। इस विधि से मनुष्य अपने जीवन में समर्पण की शक्ति को आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ाता जाता है। इस उन्नति के मार्ग पर चलता हुआ जब साधक अपना सर्वस्व विश्व की भलाई के लिये अर्पण कर देता है, तो उसके जीवन में उन्नति की प्रथम मंज़िल समाप्त होती जाती है। मगर इस प्रकार का भौतिक यज्ञ जो सब मनुष्यों के गृहस्थ के जीवन में आवश्यक है, निचली श्रेणी का कहा है। यह साधक के जीवन को सुखी बनाने और स्वर्ग प्राप्ति का साधन है, मगर मोक्ष जिसे वेद में आत्म-ज्योति कहा है उसका द्वार नहीं। वह स्थिति उससे बहुत ऊँची है और उसका मार्ग भी कठिन है, यद्यपि नामुमकिन नहीं। जैसे गीता में भगवान् ने कहा है कि बहुतेरे जीव अपनी हिम्मत से उस अवस्था को पा चुके हैं जो भगवान् का अपना स्वरूप है।

आत्म-ज्योति वेद में वह अवस्था है, जहाँ साधक के कर्म दैवी और स्वाभाविक बन जाते हैं। उसमें किसी प्रकार की फल प्राप्ति और स्वर्ग की भी इच्छा नहीं रहती। इस अवस्था का स्थूल रूप वेद में भयानक शब्दों में बताया है। मगर ऐसा प्रतीत होता है, कि उर्वशी ने (ताकि ऐसा न हो कि साधक डर जाए) इस मंजिल का वर्णन तनो दान के नाम से अपने सत्संगों में कहा है। साधक के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर, यह आत्म समर्पण की आखिरी मंज़िल है। इसे वेद की भाषा में आत्म ज्योति कहा है। यह वह अवस्था है, जहाँ साधक अपने सम्पूर्ण शरीर को सब अंगों समेत विश्व रूप भगवान को अर्पण कर देता है। अब उसमें अपनाने का भाव खत्म हो जाता है। इस पूर्ण आहुति के पश्चात् वह केवल अजन्मा अमृत स्वरूप आत्मा रह जाता है। जिसके विषय में भगवान् ने गीता में कहा है – “यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।” जिस अवस्था में साधक सभी कुछ, जिसे वह अपनाता है, भगवान् के अर्पण नहीं कर देता, आत्म-समर्पण का यज्ञ पूर्ण नहीं होता। पूर्ण आहुति ही ब्रह्म प्राप्ति का द्वार है। वेद में उसका वर्णन इस प्रकार है।

साधक भगवान से कहता है – “जो कुछ मेरा है, उसको लेकर तथा सब शरीर, सब इन्द्रियाँ, सब आत्म शक्तियाँ, सब पुरुषार्थ ले करके तुझे प्राप्त होता हूँ और तुझमें प्रविष्ट होता हूँ।”

जब साधक ने विश्व की भलाई के लिये अपने तन का भी यज्ञ कर दिया, तो व्यक्ति रूप से उठकर वह विश्व रूप बन जाता है। उसकी आत्मा जो पहले व्यक्ति रूप में अपने ही शरीर में थी, सारे विश्व में फैल जाती है। उसकी व्यक्तिगत्, पारिवारिक और जाति भाव सब मिट जाते हैं। जब सारा विश्व ही उसका शरीर बन गया तो जहाँ कहीं वह दु:ख देखता है, दुखिया को सुखी बनाने का यत्न करता है। गीता में ऐसे विश्व रूप बने हुए आत्मा को योग-युक्त कहा है। वह सब प्राणियों को समदृष्टि से देखता है। अपने आप सब भूतों में रहता हुआ और सब प्राणियों को अपने में देखता है। जीवन की इस उच्च अवस्था पर पहुँचने के लिये महायज्ञ चाहिए – जिसका वेद में इस प्रकार वर्णन है।

“पूर्व दिशा के लिए इस अजन्मा का सिर अर्पण है, दक्षिण दिशा के लिए दक्षिण करवा, पश्चिम दिशा के लिये मेरा पिछला भाग अर्पण है – उत्तर दिशा के लिए उत्तर करवा, ऊर्ध्व दिशा के लिए मेरी पीठ की रीढ़ अर्पण है, ध्रुव दिशा के लिए मेरा पेट, मध्य दिशा के लिये मेरा मध्य भाग अर्पण है। इस प्रकार सब अँगों से विश्व रूप बना हुआ मैं परमात्मा को सब तरफ से अनुभव करता हूँ।”

वेदे में इन मन्त्रों का तात्पर्य जीव को समझन के लिए यह है कि भगवान ने जो इस संसार में उसे मानुषिक चोला दिया है वह केवल उसके अपने भोग और सुख के लिए नहीं, सब विश्व की भलाई के लिए दिया है। जब तक यह विश्व को समर्पण नहीं होता, यज्ञ पूर्ण नहीं होगा। वेद का कहना है कि अजन्मा जीवात्मा ब्रह्म के तेज से प्रकट हुआ है और कर्म गति के कारण जन्म-मरण के चक्र में फंसा हुआ है। उसने अग्नि रूप आत्म ज्योति को फिर से प्राप्त करना है। पृथ्वी से अन्तरिक्ष को बढ़ना है। वहाँ से द्यौ लोक को, फिर आखरी पौड़ी आत्म ज्योति की है, जो देवों का स्थान है। जो कोई इस वेद में बताए हुई आत्मिक उन्नति के मार्ग को नहीं जानता वह ‘माँ’ के वर्तमान स्वरूप के इस पहलू को नहीं समझ सकता, जहाँ अपने सुख-दु:ख की कोई चिन्ता नहीं रही, और जीवन का केवल मात्र प्रयोजन सब दुखियों को सुखी बनाना उनका स्वभाव बन चुका है।

यह दूसरों की सेवा की बात नहीं। अब माँ की आत्मा का क्षेत्र अपना तन नहीं – वह तो महायज्ञ में भगवान को समर्पण हो चुका है। अब सारा विश्व उसका क्षेत्र बन गया है। वेद में साधक कहता है, “मैं परमात्मा की यज्ञ से पूजा करता हूँ। और स्वर्ग लोक से ऊपर चढ़ कर आत्म ज्योति की अवस्था को प्राप्त होता हूँ।”

यही इस समय माँ के वर्तमान स्वरूप का एक पहलू है।

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