माँ क्या है

श्रीमती ज्ञान भूषण

मैं माँ के विषय में लेखनी की सहायता से कुछ कहना चाह रही हूँ। माँ जैसी व्यक्तित्व को पूर्णतया जान लेना और फिर उसे प्रकट कर देना एक साधारण जीव के लिये असम्भव ही है। पर फिर भी जिस थोड़े से अंश को मैंने पकड़ा है, उसे मैं अपनी पूर्ण समर्थ लगा कर सच-सच लिखूँगी।

माँ का नाम तो बड़ी देर से सुन रही थी, रूप के दर्शन का सौभाग्य भी मिला था, पर माँ क्या हैं, उनकी क्या विशेषतायें हैं, इसका अनुभव नहीं हुआ था। भगवान की असीम कृपा से २२ अगस्त १९७३ को जब माँ का जन्म दिवस सप्ताह मनाने मधुबन गई तब माँ के व्यक्तित्व में कुछ विशेष आकर्षण का अनुभव किया। फिर भी मैंने इसको कुछ विशेष महत्व नहीं दिया तथा परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी उनका लाभ न उठाया। तब से अब तक अधिक से अधिक १५-२० बार माँ के साथ प्रश्नोत्तर रूप में सत्संग करने का सौभाग्य मिला होगा। सो थोड़े सम्पर्क के कारण मेरा अनुभव बहुत थोड़ा है, आदरणीय प्रेम स्वरूप ‘माँ’ के बारे में।

मुझे माँ में कुछ अनोखे चमत्कार का अनुभव हुआ है। वह तनधारी होते हुए भी तन नहीं हैं। उनका तन कभी उनके रास्ते में रुकावट नहीं है। इतनी अधिक शारीरिक पीड़ा भी उन्हें कभी कर्त्तव्य करने से हटा नहीं सकती है। हम उनको साकार देखते हैं पर वह साकार होते हुए भी निराकार हैं।

अपना ही नहीं, हमारा तन भी उनकी दृष्टि में विघ्न नहीं बनता। उनकी दृष्टि हमारे वाक् पर नहीं होती, परन्तु वाक् में छिपे भाव पर होती है। हमारे सूक्ष्म में क्या है इसको वह हमसे भी ज्यादा जानती हैं। जब हम प्रश्न करते हैं तब हमारे निहित भाव को जानते हुए उत्तर देती हैं। एक ही प्रश्न का उत्तर-साधक की स्थिति के अनुसार, ज्ञान-प्रधान या भक्ति-प्रधान इत्यादि के दृष्टिकोण से फ़र्क-फ़र्क आता है। ऐसा अनुभव होता है माँ एक दर्पण हैं, जिसमें हमें हमारा आंतरकि रूप दिखाया जाता है। फिर कैसी अनोखी बात है कि माँ प्रश्नकर्ता को उसका कालिमा से भरा हुआ अंत:करण भी दिखा देती हैं और फिर भी प्रश्नकर्ता मुदित मनी ही रहता है। कहने का ढंग इतना सुन्दर और अतीव दक्षता से भरपूर होता है कि चोर को चोर भी कह देते हैं और वह अपने को चोर सुन कर प्रसन्न भी हो जाता है।

सिर्फ़ यह ही नहीं, ‘माँ’ प्रेम की साक्षात् मूर्ति हैं। जब भी उनके सम्पर्क में जाती हूँ ऐसा लगता है कि वह सबसे ज्यादा प्यार मुझे ही करती हैं। उनका प्रेम पूर्ण हाथ, हाथ में पाकर क्या अनुभव होता है, यह मैं ही जानती हूँ, लिखूँ कैसे? वह तो प्रेम का एक बहता स्रोत हैं। भाग्यशाली ही उनमें गोता लगाते हैं तथा गुण रूपी रत्न निकाल लाते हैं।

‘माँ’ तो ज्ञान का असीम भण्डार हैं, भगवान के रूप स्वरूप का साक्षात् प्रमाण हैं। माँ तो कर्त्तव्य की प्रतिमा हैं। उनका उठना-बैठना, हर शारीरिक कर्म कर्त्तव्य का मौन प्रमाण है। जीवन कर्त्तव्य के बिना और कुछ है ही नहीं।

तद्रूपता क्या है यदि इसे देखना है तब माँ के जीवन से देख लो। बच्चा-बूढ़ा-ज्ञानी-अज्ञानी, स्वार्थी-परमार्थी जो भी सामने आता है उसके लिये माँ वैसी ही बन जाती हैं। पर शरीर का कोई भी रूप, वाक् और कर्म इत्यादि उन्हें छू नहीं सकता। वह सामने खड़े के लिये सब कुछ कर देती हैं और उन लोगों ने क्या किया है यह उनकी दृष्टि में कभी अड़चन नहीं बनता। सहज ही में जो उनके सम्पर्क में एक बार आ गया वह उनका हो गया। तुम कुछ भी करो वह तो तुम्हें अपना चुकी हैं। भाई! उनके बारे में क्या कहूँ – वह तो एक साकार भगवान का चलता-फिरता बोलता मन्दिर है। बच्चों के लिये माँ एक ‘वॉकी टॉकी’ गुड़िया हैं।

माँ क्या हैं इसका अनुमान आप स्वयं ही लगा लो कि कितने थोड़े समय में वह मेरे जीवन के हर पहलू में छा गई हैं – उनका रूप मेरी आँखों से ओझल ही नहीं होता। यह साक्षित्व हर पल रहता है और मुझे यह विश्वास है कि यह मेरी आंतरिक शुद्धि करवा देगा। अभी तो दृष्टि रूप पर ही टिकी है पर आशा है जब दृष्टि रूप से उठकर स्वरूप को जान लेगी जैसे कि थोड़ा-थोड़ा आंतर पहचानने लगी है, तब स्वरूप को भी नहीं भूलेगी। यही तो हर साधक के जीवन का लक्ष्य है।

जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये साधक जन्म-जन्म लगे रहते हैं और अत्यन्त परिश्रम से भी नहीं पा सकते, वह माँ के सम्पर्क से सहज ही हँसते-हँसते प्राप्त होता नज़र आता है। सारी साधना जो पहाड़ के समान दुर्गम लगती थी, अब तो एक बाग में सैर के समान सुहावनी तथा मन मोहक लगने लगती है। साधना का स्वरूप ही बदल दिया है माँ ने। जीवन बोझल नहीं रहा, संसार सुन्दर लगने लगा है।

‘माँ’ तो ‘माँ’ ही हैं। साधक में प्रेम-श्रद्धा-भक्ति की जन्म दायिनी ‘माँ’ हैं। साधक को नव जीवन प्रदान करने वाली माँ हैं।

जब मेरे जैसे विषय-रसिक जीव को इतने थोड़े समय में इतना लाभ हो गया है, तो तब ‘माँ’ क्या होंगी इसका अनुमान पाठकगण स्वत: लगा लें। मेरी असमर्थता को दृष्टिगोचर रखते हुए, लिखित शब्दों में से तत्त्व को पकड़ने का प्रयत्न करें।

‘माँ क्या है?’ यह पढ़ने से पता नहीं लगेगा यह उनके सम्पर्क में आकर अनुभव करके देखिये।

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