Chapter 18 Shloka 8

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।

He who abandons action

because it constitutes sorrow,

or due to fear of physical discomfort,

participates in rajsic tyaag.

He does not attain the fruit of such renunciation.

Chapter 18 Shloka 8

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।

Now the Lord describes rajsic tyaag.

He who abandons action because it constitutes sorrow, or due to fear of physical discomfort, participates in rajsic tyaag. He does not attain the fruit of such renunciation.

That renunciation, which is effected due to fear of sorrow, is rajsic tyaag. There, obligatory deeds are abandoned:

a) because they lead to sorrow;

b) due to fear of loss;

c) with the fear that one’s joy is at stake;

d) due to fear of physical distress;

e) because one’s time will be wasted;

f) because one’s wealth will be wasted;

g) out of fear of losing one’s prestige;

h) because they may be a hindrance in the path of procuring what one likes;

i)  because they may cause obstruction in one’s selfish purpose;

j)  due to fear of loss of peace of mind;

k) due to the fear that one’s desires may not be thus fulfilled.

Renunciation of any action, situation, individual, duty or object after such reflection, constitutes rajsic tyaag or rajsic relinquishment. The spiritual aspirant does not indulge in such relinquishment.

Understand this carefully! The spiritual aspirant can never renounce thus because:

1. He seeks to learn equanimity both in engaging in action and abstinence from action.

2. He seeks to attain equanimity in the face of acclaim or insult.

3. He is endeavouring to transcend the body-self.

4. He has to learn to be impartial towards both victory and defeat.

5. His aim is not to escape sorrow, but to become indifferent to sorrow.

Why should such a one flee from adversity?

a) He is practising the art of loving all.

b) He is practising mercy and forgiveness.

c) He is learning patience, endurance and magnanimity.

d) He merely seeks to redeem others from their sorrows.

e) He is the lover of his devotees.

f) He is practising establishment in the state of the sthit pragya – abidance in the pure intellect.

g) He is in the process of accumulating divine qualities.

Therefore the Lord says of the rajsic renunciate, “Such a one does not attain the fruit of tyaag.” The fruit of tyaag is sanyas. The fruit of tyaag is tapas. How can the one who renounces because of any of the reasons given above, attain the Lord? How can he even attain sanyas? Such a one cannot even attain the world.

Man indulges in rajsic tyaag to ensure his happiness – and in the process, loses that very happiness.

अध्याय १८

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।

भगवान अब राजस त्याग के विषय में कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. ‘दु:ख रूप ही है’, ऐसा जान कर,

२. जो कोई शरीर के कष्ट के भय से,

३. कर्म को त्याग दे,

४. तो वह राजस त्याग करके,

५. त्याग के फल को नहीं पाता है।

तत्त्व विस्तार :

दुःख रूप जान कर जो त्याग किया जाये, वह राजस त्याग है। जहाँ नियत कर्म इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि इसको करने से :

क) दुःख होगा।

ख) अपनी हानि होगी।

ग) अपने सुख का खर्च होगा।

घ) अपने तन को क्लेश होगा।

ङ) अपना समय नष्ट होगा।

च) अपना धन व्यर्थ जायेगा।

छ) अपना मान जायेगा।

ज) अपनी रुचि में बाधा आयेगी।

झ) अपने स्वार्थ में बाधा आयेगी।

ञ) अपना चैन जायेगा।

ट) अपनी कामना पूर्ण नहीं होगी।

ऐसा सोच कर किसी कर्म का त्याग करना, किसी परिस्थिति, किसी प्राणी, किसी कर्तव्य या वस्तु का त्याग करना राजसिक त्याग है।

साधक राजसिक त्याग नहीं करता।

ध्यान से समझ! साधक ऐसा त्याग कर ही नहीं सकता, क्योंकि :

1. उसे निवृत्ति या प्रवृत्ति में समता सीखनी है।

2. उसे तो मान अपमान में समता सीखनी है।

3. उसे तो तनत्व भाव से उठना है।

4. उसे तो जय पराजय में समता सीखनी है।

5. उसे तो दुःख छोड़ना नहीं, दुःख के प्रति उदासीन होना है।

वह विपरीतता क्यों छोडेगा, जिसने :

क) प्रेम का अभ्यास करना है।

ख) करुणा और क्षमा का अभ्यास करना है।

ग) सहनशील और दरियादिल स्वयं ही बनना है।

घ) विपद् विनाशक बनना है लोगों का!

ङ) भक्त वत्सल बनना है।

च) स्थित प्रज्ञता का अभ्यास करना है।

छ) दैवी सम्पदा उपार्जित करनी है।

इसलिए भगवान कहते हैं, ऐसा त्याग करने वाला त्याग के फल को नहीं पाता। त्याग का फल तो संन्यास है, त्याग का फल तो तप है। फिर समझ ले ऐसा त्याग करने वाला भगवान को क्या पायेगा, संन्यास को क्या पायेगा, वह तो जहान को भी नहीं पा सकता!

अपने सुख के लिए जीव राजसिक त्याग करता है और वह अपना सुख ही गंवा लेता है।

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